Hindi Quote in Poem by Sudhir Srivastava

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सरसी छंद - पद का मद

पद के मद में चूर हुआ जो, उससे रहिए दूर।
भूल गया वो कल तक क्या था, आज हुआ मगरूर।।

खुद को खुदा समझ बैठा है, हुआ बहुत अभिमान।
तनिक नहीं अब शेष बचा है, उसके भीतर ज्ञान।।
कल को जब ठोकर खायेगा, संग पीटेगा माथ।
कहाँ समझता आज भला वो, नहीं मिलेगा साथ।।

बँधी हुई आँखों पर पट्टी, उड़ता है आकाश।
अपने हाथों स्वयं लिख रहा, खुद के आप विनाश।।
शिकवा और शिकायत सबकी, चढ़े शीश बन पाप।। अपने पैरों मार कुल्हाड़ी, लेता है अभिशाप।।

ईर्ष्या द्वेष दंभ में प्राणी, कहाँ कभी खुशहाल।
अपनी स्वयं प्रशंसा कर ले, चलकर टेढ़ी चाल।।
हाल-चाल कोई जब पूछे, मुँह बिचकाता जोर।
नहीं किसी की वो है सुनता है, लगे व्यर्थ का शोर।।

ऐसे लोगों का नहीं भरोसा, करें मित्र हम आप।
ईश भरोसे आगे बढ़िए, मिटे सभी संताप।।
अपने पथ से आप भटककर, नहीं बदलिए रंग।
मानव जीवन की मर्यादा, मत करना तुम भंग।।

जब तक इनको समझ में आता, खट्टे हैं अंगूर।
हालत इनकी ऐसी होती, खुद कहते लंगूर।।
सत्य आइना दिखा ही देता, होता जब मजबूर।
कल तक जितना पास था इनके, आज वो उतना दूर।।

सुधीर श्रीवास्तव

Hindi Poem by Sudhir Srivastava : 112021488
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