दोहा मुक्तक
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दोषारोपण कर रहे, अब अपने ही लोग।
तेजी से है बढ़ रहा, कोरोना जस रोग।
दोषी भी हम आप हैं, देख रहे निज स्वार्थ -
और स्वयं भी सह रहे, इसकी पीड़ा भोग।।
यह जीवन है आपका, इसका रखिए ध्यान।
इसमें कुछ ऐसा नहीं, जिसे कहें विज्ञान।
नाहक खुद पर ले रहे, आप स्वयं ही भार,
अच्छा है अब छोड़ दो, बने रहो नादान।।
अब अपने ही दे रहे, बड़े प्यार से घाव।
या शायद बतला रहे, वो सब अपना भाव।।
फ़र्क मुझे पड़ता नहीं, मेरी तो है मौज -
रोक नहीं वे पा रहे, दौड़ रही मम नाव।।
चीर हरण अब हो रहा, मर्यादा का नित्य।
समझ नहीं आता हमें, इसका क्या औचित्य।
ऐसा लगता इन दिनों, हम सब बड़े अधीर-
समझ रहे सबसे बड़ा, हम तो हैं आदित्य।।
जिंदा होकर स्वयं को, मुर्दा माने लोग।
जाने क्यों हैं सोचते, उन पर है अभियोग।।
समझ नहीं है आ रहा, कैसी है यह रीति -
कोई बतलाए मुझे, रोग है या संयोग।।
हर प्राणी पर डालता, ग्रहण अपना प्रभाव।
कुछ पाते हैं बहुत कुछ, कुछ को मिले अभाव।।
दीन, धर्म, ईमान भी, घोले इसमें रंग -
सबकी अपनी भूमिका, सबका अलग स्वभाव।।
बढ़ता जाता जाल है, आज युद्ध का रोज।
पहले आपस में लड़ें, बाद शान्ति की खोज।।
कोशिश पहले हो अगर, तब बिगड़े क्यों बात-
पर दंभी जन मगन हैं, सारी दुनिया भोग।।
यादों के साए हमें, रुला रहे हैं रोज।
कभी-कभी लगता हमें, नाहक है ये खोज।
जितना हम हैं चाहते, दूर रहें ये रोग-
उतना ही हमको लगे, जैसे प्यारा भोज।।
सप्त सुरों के मूल का, सरगम है आधार।
सुर साहित्य के भाव, पढ़-सुन करें विचार।
गीत ग़ज़ल कविता लिखें, सब अपने प्रिय छंद-
सबको अपने दर्द का, मरहम सरगम संसार।।
जैसा सोचा था नहीं, वही सामने बात।
वाणी में रस घोलकर, होता है प्रतिघात।
टूट गया अब आज मैं, देख जगत की चाल-
बेशर्मी भी गर्व से, आज मारती लात।।
प्रिये मित्र यमराज की, मानी जबसे बात।
तबसे अपनी कट रही, बड़े प्रेम से रात।
शुभचिंतक अब कौन है, कैसे कह दूँ आप-
भला समझता कौन है, अब मेरे जज़्बात।।
मन उपवन सूना हुआ, मौन हृदय के भाव।
कैसी माया राम की, गहरे होते घाव।
इसमें किसका दोष है, सबसे बड़ा सवाल -
उत्तर कोई दे मुझे, जिसको बड़ा लगाव।।
उपवन में अब वो नहीं, आता है आनंद।
छिटपुट ही अब दीखते, फूलों पर मकरंद।
लगता इस पर भी चढ़ा, आज समय का रंग -
या फिर कोई कर रहा, राजनीति छलछंद।।
नव संवत्सर आ गया, लेकर नव उत्कर्ष।
प्रकृति में भी दिख रहा, अद्भुत पावन हर्ष।
हम सबको ही गर्व है, बढ़े सनातन मान
सत्य सनातन धर्म का, करते रहें विमर्श।।
नव संवत्सर दे हमें, नव उर्जा विश्वास।
और संग में रख रहा, हमसे थोड़ी आस।
हमको भी तो दीजिए, वही मान सम्मान -
जितना होता आपको, आंग्ल वर्ष उल्लास।।
आते हमको याद हैं, वो भी आँसू आज।
जिसे देख मैं था डरा, जब समझा था राज।
ममता की सौगात का, मिला एक उपहार -
ईश्वर की अनुपम कृपा, रिश्तों का ये ताज।।
भक्ति शक्ति का आ गया, फिर नवरात्रि पर्व।
श्रद्धा और विश्वास का, अद्भुत दिखता गर्व।
आदिशक्ति माँ की कृपा, बरस रही चहुँओर-
जन-मानस की साधना, हर्षित गर्वित सर्व।।
देवी दुर्गा शक्ति की, महिमा अमिट अपार।
पूजन पाठन भजन में, डूबा है संसार।
धूप-दीप संग आरती, जप-तप होता ध्यान -
निज भक्तों को माँ करें, भव-बाधा से पार।।
भक्ति, शक्ति, विश्वास का, अद्भुत है गठजोड़।
व्यर्थ समय मत कीजिए, नहीं खोजिए तोड़।
खुशियों संग जीवन सदा, जीते रहिए आप-
समदर्शी निज भाव से, पार करो हर मोड़।।
संकट में भी चल रहे, नेता अपनी चाल।
शर्म नहीं है आ रही, बजा रहे हैं गाल।
लगता इनका लक्ष्य है, बना रहे गतिरोध -
जैसे केवल चाहते, जनता करे बवाल।।
जीवन में सबके कभी, आता है गतिरोध।
चाहे जितना हम सभी, करते रहें विरोध।
चिंता छोड़ के कीजिए, स्वागत इसका आप-
लेने आता कब भला, यह कोई प्रतिशोध।।
फटे वस्त्र फैशन बने, देख आधुनिक रंग।
शर्म बेच खाई सभी, पीते जमकर भंग।
लाज किसे अब आ रही, आजादी के नाम -
अभिव्यक्ति की आड़ में, नाचें नंग धड़ंग।।
शर्म किसे अब आ रही, बनी नग्नता धर्म।
संकट का आधार है, पीछे इसके मर्म।
फैशन के इस दौर में, आती किसको लाज-
फटे वस्त्र फैशन बने, मात-पिता भी नर्म।।
प्रेम-प्यार सद्भावना, मृदुल आप व्यवहार ।
बना रहे हम सभी के, खुशियों का संसार।।
ऐसा कुछ करना नहीं, जिसका नाम गुरूर-
जीवन सबका तरल हो, जस नदिया रसधार।।
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राम कहानी
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राम कहानी हम सभी, भले रहे हैं जान।
पर देते कब राम को, आप उचित सम्मान।
भले आप हम कुछ कहें, और मान लें भक्त-
मर्यादा के राम का, हम करते अपमान।।
राम नाम का कीजिए, जाप भले ही नित्य।
तब तक इसका है नहीं, मानें हम औचित्य।
जब तक गुण भी राम का, लेते नहीं उतार -
राम कहानी व्यर्थ है, झूठा नभ आदित्य।।
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सरसी छंद
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देख-देख सब काँप रहे हैं, बढ़ता जाता युद्ध।
हाथ जोड़कर देख रहे हैं, राह महात्मा बुद्ध।
नहीं बोध है आज किसी को, कल क्या होगा हाल-
आँख मींच बस करते चिंता, संग चित्त को शुद्ध।।
सुधीर श्रीवास्त