“अधूरी समझ”
मेरे दिल की तड़प तुम समझ न सके,
इस मोहब्बत का मर्म समझ न सके।
ख़्वाब आँखों में हर रात सजते रहे,
उन उजालों का रुख़ समझ न सके।
धड़कनों में छुपी एक सदा गूंजती,
उस पुकारों का अर्थ समझ न सके।
पास रहकर भी दूरी का आलम रहा,
इस क़रीबी का सच समझ न सके।
हर डगर पर निभाने की चाहत रही,
तुम वफ़ाओं का ढंग समझ न सके।
दर्द आँखों से चुपचाप बहता रहा,
लब पे ठहरी शिकायत समझ न सके।
अब कोई भी गिला दिल में बाकी नहीं,
इस खामोशी का रंग समझ न सके।
"प्रसंग" दिल में गहरा समंदर रहा,
उस लहर का असर समझ न सके।
- प्रसंग
प्रणयराज रणवीर