"ओ गुलाबी लड़की"
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गुलाबी हथनी पर
बैठी गुलाबी लड़की
जंजीरों में बंधा
होना ही शाश्वत
दुनिया है।
लकड़ी की मेज पर
इंसानों सा खाना
तुम्हें कभी परोसा
न जाएगा।
ख़ाब देखना
देख कर चलना
पूर्वनिर्धारित है,
प्यारी हथनी
तुम स्वतंत्र नहीं हो
न ही फैसला ले सकती हो,
क्या कहां
तुम्हारी दृष्टि
दूर तलक देख सकती है?
मैं कहता हु
बग्गी में बैठी
हीराबाई की
नजरों को
हर हीरामन नहीं पहचानता है।
तुम्हारा कोई प्रेमी
बस तुम्हारे लिए
अपने मुक्त जंगलों
में बसे आजाद झुंड को
आखिर किस शर्त पर
छोड़ेगा,
उसे भी
रंग दिया जाएगा
गुलाबी रंग में
ऐसा रंगरेज कहां है
जो कैस की तरह
तुममें पूरी तरह
गुलमिलता हुआ
भटके समाज के
जालिम नियम आखिर कोई
प्रेमी क्यों तोड़े।
जंजीरें ही तुम्हारा अर्धवंचित
प्राक्तन है, था और रहेगा।
भूल जाना कि
कोई तुम्हे
चाहता हुआ
आयेगा बेड़ियों से निकालने।
ओ लड़की
नादान हो
कमाल की बहकी
हुई बेहकूफ हो,
फैसलों से भरी इस
सभा में कोई कृष्ण नहीं
देगा हाथ।
यहां बस
अंधे धृतराष्ट्र मिलेंगे
हर चौराहों पर,
या भीष्म जो कट्टपा की तरह
बहुत कुछ तो कर सकता है
वह पानी डालकर गुलाबी रंग धो सकता है
पर वह ऐसा नहीं करेगा।
दुर्योधन
के लिए कितने
कर्ण झुकेंगे
तुम्हारी लड़ाई
कोई सूतपुत्र
नहीं लड़ेगा
नादान लड़की।
बहस करना
बेकार हैं
हर तरफ घूमते हुए
मदद की पुकार
तो उस अवस्था से
भी गई गुजरी है
जिस हालत में
शहरी नाली पर
पड़े होते है मूर्छित लोग।
यहां बस
लाचारी से होते
हुए वस्त्रहरण देखनेवाले
लोग मिलेंगे।
जिस भीड़ को
'धूम' पसंद है
'धूम' उसका नाम है
जो गला फाड़ते हुए
गाता है
दिल न दिया
दिल न लिया
तो बोलो क्या किया…
न तो उसका संगीत
अच्छा है
न ही वह लड़का
कोई शास्त्रीय लय जानता है
जनता बस
उसकी बदहाली
देखना चाहती है
बिल्कुल गुलाबी
हथनी पर बैठी
किसी गुलाबी लड़की
की तरह
वे देखते हैं
शरीर
वे देखते है
चमड़ा
वे देखते हैं
भूगोल
भीतर का
रक्त, मांस, हड्डियां
कोई क्यों देखे,
कोई क्यों हीरामन की तरह
मन के जाल में फंसे
क्यों कोई तुम्हारे
लिए तीसरी कसम
में डूब जाए।
बस इतना
ही सच है
गुलाबी कन्या
की इस दुनिया में
न्याय या सत्य
जैसा सुंदर कुछ नहीं
पर सबको
क्रूरता और
अत्यंत अन्याय ही
लुभाता है।
गुलाबी हथनी पर बैठी
गुलाबी लड़की
तुम्हें पहाड़ों, जंगलों, झीलों
में अपना अस्तित्व खोजना होगा।
जहां इंसानी हाथ
न पहुंचे
हां, उसी स्थान का
चुनाव तुम्हें करना होगा
किसी खोह में
उकेरे गए चित्र की तरह
उनमें भरे रगों की भांति
तुम्हें सवाल पूछना होगा।
सवाल आत्मा की तरह
शाश्वत नहीं है
उसे जलाया भी जाता है
सवाल भीगता भी है
उसे काटा भी जाता है
पर तुम अड़ींग रहना
प्रश्न पूछती रहना,
ऐसा है तो क्यों
वैसा है तो क्यों।
तुम पूछोगी
तो वे हँसेंगे
हँसी में छुपा देंगे
तुम्हारा ही प्रश्न।
कहेंगे—
यही रीति है
यही परंपरा है
यही दुनिया का ढंग है।
और तुम सोचोगी
कब से?
किसने लिखा था
यह पहला नियम
कि गुलाबी रंग
ही तुम्हारी त्वचा होगा?
किसने पहली बार
तुम्हारी हथनी के पैरों में
लोहे की आवाज बाँधी थी?
क्या वह भी
किसी और का आदेश
मान रहा था?
या वह खुद
किसी और रंग में
रंगा हुआ था?
तुम देखोगी
उन हाथों को
जो तुम्हें दुलारते हैं
और वही हाथ
तुम्हारी जंजीरों की
गांठ भी कसते हैं।
तुम पहचानोगी
कि प्रेम और स्वामित्व के बीच
एक पतली सी रेखा है
जो अक्सर
दिखाई नहीं देती।
और जब दिखती है
तब तक
बहुत देर हो चुकी होती है।
तुम उतरना चाहोगी
उस हथनी से
धीरे से
बिना आवाज किए,
पर तुम्हारे उतरते ही
जमीन हिल जाएगी
जैसे कोई अपराध हुआ हो।
लोग इकट्ठा होंगे
और पूछेंगे—
किसने दी तुम्हें
नीचे आने की इजाज़त?
तुम चुप रहोगी
क्योंकि तुम्हारे पास
कोई उत्तर नहीं होगा
जो उनकी भाषा में फिट बैठे।
तुम्हारी चुप्पी
उन्हें और साहसी बनाएगी
वे तुम्हारे चारों ओर
एक नया घेरा बनाएंगे
और कहेंगे—
देखो, यही है
अराजकता।
तुम्हें फिर से
चढ़ा दिया जाएगा
उस गुलाबी ऊँचाई पर
जहाँ से
तुम सबको देख सकती हो
पर छू नहीं सकती।
तुम्हें समझ आएगा
ऊँचाई भी
एक कैद होती है।
और उस दिन
पहली बार
तुम्हें अपनी ही आवाज
अजनबी लगेगी।
तुम उसे पुकारोगी
जंगलों में
पहाड़ों में
झीलों के किनारे—
पर वह लौटकर
नहीं आएगी
क्योंकि उसे भी
शहर में रहने की
आदत हो गई है।
फिर भी
किसी एक रात
जब सब सो जाएंगे
और गुलाबी रंग
अंधेरे में
थोड़ा फीका पड़ जाएगा,
तुम अपनी उँगलियों से
खुरचोगी उसे
धीरे-धीरे
जैसे कोई
पुरानी दीवार से
नमी हटाता है।
नीचे से
दिखेगा
तुम्हारा असली रंग—
अधूरा,
अनगढ़,
पर तुम्हारा।
तुम डरोगी
कि अगर यह दिख गया
तो वे तुम्हें
पहचान नहीं पाएंगे।
फिर तुम सोचोगी—
क्या कभी
पहचाना भी था?
और उसी क्षण
एक बहुत छोटा
पर सच्चा प्रश्न
तुम्हारे भीतर जन्म लेगा—
अगर मैं
गुलाबी नहीं हूँ,
तो मैं कौन हूँ?
और शायद
यही वह जगह है
जहाँ से
जंगल शुरू होता है।
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