"दूर कही जब"
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तुम्हें देखना चाहता था
हरे रंग की सारी में
बेलों का पल्लू ओढ़कर
किसी मजबूत तने सी।
तुम्हारी नाभी कि
खोह पर मरते था
किसी को क्या पता
कितना अंधकार उसीस्थान से जन्म लेता रहा।
दूर तक फैलें नीले
रंग में डूबी तुम्हारी
हरे रंग की आंखें
जिसमें मेलोलिन
की कमी थी
बस उसी हिस्से में
मैं मुसाफिर दुबक बैठा था
दुबक बैठा था किसी कीट की तरह।
जल प्रपात में
बहता हुआ सामान्य
जीवन जीना चाहता था
तुम्हारे संग
बस एक छोटा रोजगार
उतना ही छोटा घर
उसके आंगन में झाड़ू लगाती
तूम!
कितना सूक्ष्म
सपना था ये
क्या पता था
कभी तो
नींद खुल जाएगी,
प्रिये
तूम इंतज़ार मत करना
अब मैं मुचकुंद के
वरदानी निंद्रा से बाहर
आ गया हु,
सामने वासुदेव खड़े है
मुझे नहीं पता वे कौन हैं
उनकी दिव्यता में डूब रहा हु।
उनका इंतजार करती
कोई थी
या शायद है
तुम्हारी तरह
वृंदावन के किसी अरण्य में
इंतजार करती हुई
उनके पहले उसका
नाम आ जाता है।
विरह मीठा है
या उसका कोई स्वाद ही नहीं है।
फिर भी
कभी-कभी
रात के तीसरे पहर में
जब नींद का जल
धीरे-धीरे उतरता है
और चेतना की रेत
नंगी होने लगती है,
तब
तुम्हारी वही हरी साड़ी
किसी वृक्ष की छाल की तरह
मेरे भीतर उग आती है।
मैं छूना चाहता हूँ उसे
पर उंगलियाँ
काई से ढकी किसी स्मृति पर
फिसल जाती हैं।
तुम्हारी हँसी
अब किसी ध्वनि की तरह नहीं
बल्कि
एक अधूरी प्रतिध्वनि है
जो गूंजती नहीं—
बस ठहर जाती है
सीने के किसी अंधे कुएँ में।
मैंने सोचा था
जाग जाना ही मुक्ति है
पर यह जागना भी
एक और प्रकार की नींद निकला—
जहाँ
तुम नहीं हो
पर तुम्हारा न होना
हर जगह उपस्थित है।
वासुदेव की आँखों में
जब भी झाँकता हूँ
तो एक क्षण के लिए
तुम्हारी परछाई
जल पर बनती है
और उसी क्षण
टूट भी जाती है।
क्या तुम वही थी
जिसे मैं प्रेम कहता था?
या तुम वह द्वार थी
जिससे गुजरकर
मैं इस अनंत रिक्ति में आ गिरा?
अब
जब कोई नाम लेता है तुम्हारा
तो वह नाम
शब्द नहीं रहता
एक धीमा कंपन बन जाता है
जो
हड्डियों तक उतर जाता है।
मैंने त्याग दिया है
तुम्हें पाने का स्वप्न,
पर तुम्हें खोने की प्रक्रिया
अभी भी जारी है।
और शायद
यही विरह है—
न मिलना नहीं,
न खोना,
बल्कि
दोनों के बीच
अनंत समय तक
लटका रहना।
कभी सोचता हूँ
यदि फिर से
वही छोटा सा घर मिले,
वही आँगन,
वही झाड़ू लगाती हुई तुम—
तो क्या मैं
वापस चला जाऊँगा
उस सरल अज्ञान में?
या
यह जानकर भी
कि वह सपना है,
मैं फिर से
उसी में डूबना चाहूँगा?
उत्तर नहीं मिलता।
बस
एक शांत स्वीकृति है—
कि तुम
अब कोई स्त्री नहीं,
न ही कोई स्मृति,
तुम
एक अवस्था हो
जिसमें
मैं कभी था,
और अब नहीं हूँ।
और शायद
इसीलिए—
विरह का कोई स्वाद नहीं होता,
क्योंकि
वह स्वयं ही
स्वाद लेने वाला
हो जाता है।
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