"बदलाव"
____________________________________________________
नदी के पास रहनेवाला आदमी
रोज नदी को लहराते
अंगड़ाई भरते हुए देखता था।
बारिश के मौसम में
उफान से भरी
नदी।
तूफान से बाहर
झूलती हुई नदी
झोपड़ियां या पक्के
मकानों में फर्क न करती
नदी।
ठंड के दिनों में
सिकुड़ती नदी,
हवा के प्यार में
मदहोश फरवरी
में उदास नदी।
गर्मी बर्दास्त करती
आत्महत्या के करीब
पहुंच चुकी नदी।
फिर एक गड्ढा
पत्थरों से घेरा हुआ
नदी का न होना ही
नदी का होना था।
ये बात आदमी समझ चुका
कि,
अब शायद
नदी बादलों से
उसे घूर रही थी।
उसने इंतजार किया
बहुत लंबा इंतजार
उस साल बारिश न हुई।
ठंड काफी न थी
राते ऊबती हुई
टूटती थी।
फिर गर्मी के अंत में
मई के करीब
बरसी नदी।
ये वह नदी तो न थी
जिसे आदमी
लहराते हुए
अंगड़ाई भरते देखता था।
अब नदी बदल चुकी थी
उसकी शुष्क आंखों में
कोई निवारण
या सपने नहीं थे।
लेकिन आदमी खड़ा रहा
वही किनारा
वही पत्थर
वही गड्ढा,
सिर्फ़ नदी नहीं थी।
वह खालीपन था
जिसमें समय ने अपने हाथ डाले थे,
और आदमी ने जाना
कि नदी कभी स्थिर नहीं होती,
कि वह बहती है
सिर्फ़ अपने अंदर,
हमारे भीतर।
हर लहर अब उसकी याद थी,
हर उफान उसकी भीतरी आवाज़,
और हर सूखा किनारा
उसके अपने इंतजार का प्रतीक।
नदी बदल चुकी थी,
पर आदमी बदल चुका था।
उसने देखा,
कि कुछ खोने में भी
जीवन की सच्चाई छुपी होती है—
एक अंतहीन बहाव,
जो हमेशा आगे जाता है,
साँसों की तरह,
अविरल।
नदी अब चुप हो चुकी थी,
लेकिन उसकी लहरों की गूंज
अंदर गहरे कहीं सुनाई देती थी।
आदमी ने हाथ फैलाया,
जैसे किसी नाम-अज्ञात साथी को पकड़ रहा हो,
लेकिन हवा खाली थी,
और पानी केवल याद बनकर बहे जा रहा था।
हर पत्थर, हर किनारा
उसके अपने अंदर के दर्द की तरह ठहरा,
और वह समझ गया—
नदी का बहना कभी रुकता नहीं,
बस रूप बदलता है,
जैसे इंसान का मन।
उसने देखा,
कि जो खो गया था
वह कभी लौट कर नहीं आता,
लेकिन उसकी जगह
कुछ नया पैदा होता है—
एक नया इंतजार,
एक नई उम्मीद।
अभी भी, हर सुबह
नदी की सूखी रेत में
सूरज की पहली किरण
उसकी आँखों में
कुछ चमक छोड़ जाती थी,
जैसे सब कुछ खत्म नहीं हुआ।
और आदमी बैठा रहा,
खामोश,
लेकिन अब पहले से अलग—
नदी के साथ बहता हुआ,
अपने भीतर की नदी को महसूस करते हुए।
क्योंकि नदी बदलती है,
और मन भी—
लेकिन बहाव हमेशा जारी रहता है।
______________________________________________