"तैरती जमीन"
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दूरी नापी जाती है
'अचानक' का कोई
नाप नहीं होता,
समय अपनी सबसे
दुर्गम चाल इसी शैली में
गहराई से खेलता है।
लाल,
नीला,
बैंगनी,
पीला,
सब के भीतर
अनंत दुख का समुद्र है
हां, वही गिनती लायक जीवन है।
सबकुछ हमसे बिखरते हुए
फैल रहा है
या नजदीक आ रहा हैं
इसका कोई समीकरण नहीं
अंतर भ्रम से उपजा
मापदंड है।
मृदुलता में कोई भी
रह नहीं सकता
कठोर बन पाना ही
हर स्थिति की नीयती है।
सबसे ठोस शब्द
'नहीं' है
जिसे कोई संगीत दे
नहीं पाता।
अचानक लापता हुई
वह लोरिया कोई धुन नहीं थी
न थी वह किसी रंग में डुबोया
संगीत।
सुशिक्षित समाज में
कोई सुरक्षा नहीं होती
वहां मां की लोरिया दम
तोड़ती नजर आती है।
रात की पीली साड़ी में
मर्क्यूरी के नीचे
सड़क पर चलते हुए
जलता हुआ पतंगा
इस कहानी की अंतिम पंक्ति
नहीं बन पाता।
बुखार में तड़प रहा
जीव अपने ही
समय में बंदा हुआ
खुद को असीमित
गर्मी के हवाले कर देता है।
हर तरफ देखते हुए
सलाखों से दूर किसी
बियाबान निर्मनुष्य रोड पर
प्रकाश और अंधकार के
बीच फंसा हुआ महसूस
करता हु।
इस दूरी का कोई
अर्थ है
या महफूज रहेगा
मेरा यहां होना
शायद
होने का कोई अर्थ नहीं।
मेरा वक्त
कभी नहीं आएगा
दौर को पैदा करते
मैं यू ही प्रसव वेदना में
खुद को अनंत शुभकामनाएं
देते हुए पीड़ित की तरह न्याय
नहीं मांगना चाहता हूं।
रेत पर पड़ा हुआ
खयाल उसके लिए
हड्डी की तोड़ती ठंड में
सिकुड़ते हुए अपने आप ही
किसी मच्छर की तरह खून
चूसता हुआ मर जायेगा।
और मैं कभी
नाप नहीं पाऊंगा
तैरती जमीन को।
और शायद
नापने की कोशिश ही
सबसे बड़ी भूल थी,
क्योंकि जो तैर रहा है
वह सिर्फ जमीन नहीं
मेरे भीतर का केंद्र है
जो किसी भी दिशा में
स्थिर नहीं होता।
मैंने कई बार
अपने ही कदमों के नीचे
ठोसपन खोजा,
पर हर बार
पांव धँसते गए
किसी अदृश्य तरल में,
जहाँ गिरना भी
एक घटना नहीं रह जाता।
वहाँ
ऊँचाई और गहराई
एक ही रेखा पर
धीरे-धीरे सड़ती हैं,
और मैं
उसी सड़न को
समय कहकर पुकारता हूँ।
मेरे आसपास
चलती हुई आकृतियाँ
लोग नहीं हैं,
वे अधूरे निर्णय हैं
जो शरीर बनाकर
मुझसे टकराते रहते हैं।
उनकी आँखों में
कोई दृष्टि नहीं,
सिर्फ प्रतिबिंब हैं
जिनमें मैं
हर बार थोड़ा-थोड़ा
कम होता जाता हूँ।
और एक क्षण ऐसा आता है
जब “कम होना” भी
कोई प्रक्रिया नहीं रह जाती,
वह बस
एक स्थायी स्थिति बन जाती है—
जैसे
शब्दों के बीच
छूट गया अर्थ।
मैंने सुना है
कि किसी समय
इस तैरती जमीन के नीचे
एक और जमीन थी,
जहाँ लोरियाँ
मरती नहीं थीं
बल्कि धीरे-धीरे
नींद में बदल जाती थीं।
पर अब
नींद भी
एक खुरदरी सतह है,
जिस पर लेटते ही
सपने शरीर में
काँच की तरह चुभने लगते हैं।
मैं जागता हूँ
या सोता हूँ—
इसका कोई अंतर नहीं,
दोनों ही अवस्थाएँ
मुझे एक ही जगह
बार-बार छोड़ जाती हैं,
जहाँ
प्रकाश और अंधकार
एक-दूसरे को
समझने की कोशिश में
खुद ही घुल जाते हैं,
और मैं
उस घुलनशीलता का
अंतिम अवशेष बनकर
अपनी ही पकड़ से
फिसलता रहता हूँ।
शायद
यही कारण है
कि अब मैं
किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुँचता,
क्योंकि निष्कर्ष
हमेशा ठोस होते हैं,
और मैं
अब किसी भी ठोस चीज़ पर
विश्वास नहीं कर पाता।
मैं सिर्फ
एक फैलता हुआ प्रश्न हूँ
जिसका उत्तर
हर बार
थोड़ा और दूर चला जाता है,
जैसे
किसी बियाबान सड़क पर
पीली रोशनी के नीचे
चलता हुआ वह पतंगा
जो जलते-जलते भी
रुकता नहीं—
और अंत में
न रोशनी बचती है
न अंधकार,
सिर्फ
एक अनिश्चित कंपन,
जिसमें
मैं
और यह पूरी दुनिया
धीरे-धीरे
एक ही गलती में बदल जाते हैं।
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