Hindi Quote in Poem by Anup Gajare

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"छह साल का बच्चा"
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वास्तविक हकीकत क्या है
कि सब बेखबर है
वह डरे हुए
खुद में ही सहमे पड़े रहते हैं।

डर संक्रामक नहीं होता
उसके वजूद का भी कोई मतलब नहीं
भविष्य में पिरोया गए
बीज उगने के चांस कम नहीं होते
पर गर गर्मी ज्यादा हो। या उस साल बारिश न हो तो?
भय के ये बीज दिमाग के
अमिगडाला की रेत में
ठीक से पनप नहीं पाते।

क्या बात ये जानता है
हर कोई गोया।

सबकुछ फिर से बंद हो जाने की
सिहरन ही रोंगटे खड़ा कर रही है
भीड़ अनजान है
अनजानता की गुफाओं में ही
अजंता के लेनिया उकेरी जाती है।

अंधकार अब नहीं खौफ देता
उसका इलाज अब एक बटन है
पर आग से जंगल आज भी तो
जलते ही है न गोया।

असुरक्षा
सबने देखी है
लगभग छह साल पहले को याद करो
हां, गोया वही तो भीतर बसे इस अंधकार ने
जन्म लिया था,

वह कारागृह
जिसमें हम दबे पड़े थे
जहां घर की भीड़ इकठ्ठा थी
झगड़े हो रहे थे।

तो कुछ भीड़ का हिस्सा
सड़क से होते हुए
अपने घर जाने के लिए
लालसाइयत था
वहां जाकर बस अन्न की
तलाश जैसे खत्म होनेवाली थी।

वे लोग अपनी गुफाओं में
लौट रहे थे
रोटियों की चोरी आम बात हो गई थी।

गोया डर वही पैदा हुआ
तोतली जुबान से
सबके सीने में गड्ढा
बनाते हुए वही तो इस
रोग की पहली सुरंग खोदी गई थी।

किसी रेखा के
नीचे आने का इंतज़ार
यही डर की पहली मिट्टी थी।

उसके बाद
हर मनुष्य शिकार करने लगा
लेकिन अपने अवजारों पर
उसका यकीन कम हो गया।

अब उसे पता नहीं कि
इस रेखा के नीचे
जो भूख रहती है
उससे कैसे लड़ना चाहिए।

भीख से भूख
का सफर
यही डर का हिस्सा है।

वह छह साल का बच्चा
अब भी वहीं खड़ा है
रेखा के इस पार
या शायद उस पार—
उसे खुद भी नहीं पता।

उसकी आँखों में
कोई दर्शन नहीं
कोई अमिगडाला नहीं
सिर्फ एक खाली कटोरा है
जिसमें वह
आसमान भरने की कोशिश करता है।

वह पूछता नहीं—
क्योंकि सवाल पूछने के लिए
शब्द चाहिए होते हैं
और उसके पास
सिर्फ आवाज़ है
जो गले में अटक जाती है।

भीड़ उसे देखती है
पर पहचानती नहीं
जैसे वह
भीड़ का हिस्सा नहीं
बल्कि उसका साया हो।

वह खेलना चाहता है—
पर खेल अब
शिकार में बदल चुका है
जहाँ खिलौने नहीं
रोटियाँ छुपाई जाती हैं।

उसकी हँसी
किसी पुरानी गुफा में
उकेरी गई अधूरी आकृति जैसी है
जिसे कोई इतिहासकार
कभी पढ़ नहीं पाएगा।

और वह डर—
जिसे तुम कहते हो
कि संक्रामक नहीं होता—
वह बच्चे के भीतर
धीरे-धीरे
भूख की भाषा सीख रहा है।

अब वह डरता नहीं
वह बस देखता है—
कि कैसे
एक आदमी दूसरे आदमी को
रोटी से मापता है
और इंसान
रेखाओं में टूट जाता है।

उसके छोटे हाथ
अब फैलते नहीं
सिमटते हैं—
जैसे दुनिया को पकड़ने की जगह
वह खुद को बचा रहा हो।

और एक दिन—
बिना किसी शोर के
बिना किसी घोषणा के—
वह बच्चा
भीड़ में शामिल हो जाएगा।

वही भीड़
जो अनजान है
और अनजान ही रहना चाहती है।
फिर कोई और
छह साल का बच्चा
उसी जगह खड़ा होगा
एक नए कटोरे के साथ
और आसमान फिर से
थोड़ा छोटा हो जाएगा।

अब उसके पास
गैस सिलेंडर या
शायद
खाना बनाने के लिए तेल ही बचा न हो
और उसके पापा की
गाड़ी में पेट्रोल होने के चांस बहुत कम है।

यही डर है
है न?
जो आहिस्ता-आहिस्ता
हकीकत में तब्दील हो रहा है।
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Hindi Poem by Anup Gajare : 112020142
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