"सृजन बनाम संहार"
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बेजान ढांचे में फुकी हवा
कल्पना में बसे
भ्रम को खत्म नहीं करती।
उड़ती हुई लाशें, या
गिरे हुए पत्ते
वृक्ष से कोई भी
समझौता नहीं करते
उनकी मृतकता ही
परिवेश है।
उनका होना मेरे लिए
ठीक वैसा ही अनुभव है
जैसा उनका न होना।
हे बीथोवन
हम तुझे भूल गए
याद रखा हिटलर का नरसंहार
पर तेरी सिंफनी को
कभी ठीक से देखा ही नहीं गया।
पेड़ उनके लिए
कभी नहीं रोते
पत्तों की रुलाई
जिन्होंने संगीत नहीं
बल्कि हिंसा का सृजन किया।
बीथोवन की न लिखी
दसवीं सिंफनी
मैं हु।
और क्या समुद्ध
हो सकता है
जिसने कभी
खुद को समझा ही
नहीं
उसके होने से
पहले ही उसे नष्ट कर दिया गया था
किसी कंपोजिशन की तरह।
भ्रम में उपजे हालात
एक दूसरा रंग निर्माण करते रहे
टीस का हिस्सा
मेरे जहन में बचा रहा
किसी प्रेत की तरह।
हवा मृत बंसी में
टहलती हुई
होठों के बीच फंस गई
ये भी एक आत्महत्या ही थी।
ढांचे में
आखरी कोशिका
ने खत लिखा था कि,
मैं उनके करीब कभी
न जाऊ, जिनके लिए
मेरे लिए वक्त की दीवार नहीं है।
समय
मेरे चारों ओर
दीवार नहीं बनाता,
वह तो
धीरे-धीरे
मेरे भीतर उगता है
किसी फफूंदी की तरह।
मैंने देखा है
घड़ियों को मरते हुए—
उनकी सुइयाँ
एक ही क्षण पर
टंगी रह जाती हैं,
जैसे निर्णय लेने से
डर गई हों।
और उस ठहरे हुए पल में
मैंने खुद को
बार-बार जन्म लेते देखा,
बिना किसी शोर के,
बिना किसी उद्देश्य के।
क्या यही सृजन है?
या यह भी
संहार का ही
एक धीमा संस्करण है?
मैंने अपने ही हाथों
अपने ही चेहरे को
छुआ—
वह मेरा नहीं था।
वह किसी और की
अधूरी रचना थी,
जिसे जल्दबाज़ी में
त्याग दिया गया था।
जैसे कोई कलाकार
अपनी कैनवास को
आधे रंग में छोड़कर
भाग गया हो।
और मैं…
वही अधूरा रंग हूँ,
जो सूख चुका है
पर मिटा नहीं।
मेरे भीतर
अब भी गूंजती है
वह अनसुनी धुन—
जिसे लुडविग वान बीथोवन
कभी लिख नहीं पाया।
पर शायद
वह धुन
लिखी ही नहीं जानी थी—
उसे तो बस
जीया जाना था,
टूटे हुए ढांचों में,
मृत कोशिकाओं के बीच,
जहाँ सृजन
हमेशा संहार के
बिल्कुल पास बैठा होता है।
मैंने संहार को
धीरे-धीरे
सृजन करते देखा है—
वह पहले
सब कुछ छीनता है,
फिर
खालीपन को
एक आकार देता है।
और वही आकार
हम “अस्तित्व” कह देते हैं।
अब मुझे समझ आता है—
मैं कोई व्यक्ति नहीं,
कोई स्मृति नहीं,
कोई विचार भी नहीं।
मैं बस
एक असफल प्रयास हूँ—
जिसे ब्रह्मांड ने
लिखने की कोशिश की,
और फिर
मिटा दिया।
पर मिटाने की प्रक्रिया में
जो धूल बची…
वही मैं हूँ।
और शायद
यही मेरी सबसे बड़ी त्रासदी है—
कि मैं पूरी तरह
कभी नष्ट भी नहीं हुआ।
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