"धपाक"
____________________________________________________
ढूंढते हुए पहुंचे थे
अनंत की दीवारों
में बनी सुरंग के रास्ते।
एक गली जिसकी लंबी
सड़क पर हर शाम कोई
अपने पद के चाप पीछे
छोड़ जाता।
मंदिर में ठीक सात बजे
गूंज उठती आरती की
लय।
घंटी के अनुवाद
करना मुश्किल था
सूक्ष्म कण सिमटे
हुए थे हवाओं में।
गरज़ते बादल
तूफान बस थोड़ी देर
पर रुका हुआ कोई मुसाफ़िर था।
किसी देवता की
आरती में खडे
वह बस तालिया पीटते हुए
कर रहा था प्रसाद का इंतजार।
मंदिर चौंकानी हिस्से में
प्रदक्षिणा करते हुए
हर अणु घूम रहा था।
इलेक्ट्रॉन हाथ ऊपर उठाते हुए
प्रोटॉन को छूने की लगातार कोशिश
करते रहे।
आरती के मंत्र
कानों में घूमते हुए
अपनी लकीर खींच रहे थे।
तभी वह विस्तृत
विस्फोट हुआ
पहले रौशनी दिखी थी
या आवाज आई।
न मालूम के बिच में
फंसी भिड़ के किनारे
वह अज्ञात खड़ा था।
उसे पैदल ही
अपना रास्ता प्राप्त करना था।
अगली सुबह
बारिश के चिन्ह
प्रूफ के भीतर बसे थे।
सड़क गिली हो चुकी थी
और मंदिर का हर कोना
अब खंडहर में तब्दील हो चुका था।
कोई बोला बम फूटा
लेकिन मैं जानता हु
ये धमाका वही था
जिससे विश्व का निरन्तर निर्माण हुआ।
दुनिया सिकुड़ गई थी
या फ़ैल रही थी
बचे हुए हिस्से लेकर।
वह धमाका सच था
या वह रौशनी
या आवाज।
कोई ठीक से बोल न सका
बस वजूद को उभरते हुए
राख के नीचे दबी अस्थियों
में जले शरीर उठाये जा रहे थे।
बारिश के कुंद
मौसम में
ये क्या हुआ था
इसका पता अबतक
नहीं हुआ।
राख अभी पूरी तरह ठंडी नहीं हुई थी
उसमें कुछ अंगारे
जैसे यादें
धीरे-धीरे सांस ले रही थीं।
वह अज्ञात
भीड़ के छूटते किनारों से
अंदर की ओर बढ़ा—
जहाँ आवाजें अब नहीं थीं
पर उनकी लहरें
दीवारों से टकराकर
वापस आ रही थीं।
एक टूटी हुई घंटी
मिट्टी में आधी दबी हुई
अब भी हिल रही थी—
किसी अंतिम स्पर्श की तरह।
उसने हाथ बढ़ाया
पर छुआ नहीं,
जैसे उसे डर हो
कि कंपन फिर शुरू हो जाएगा।
हवा में तैरते कण
अब भी गोल-गोल घूम रहे थे
जैसे प्रदक्षिणा अधूरी रह गई हो
और समय
उसी चक्र में अटका हो।
उसने ऊपर देखा—
आसमान वैसा ही था
या शायद थोड़ा और खाली।
बादल जा चुके थे
पर उनकी गूंज
अब भी पसरी हुई थी
हर उस जगह
जहाँ कुछ था…
और अब नहीं था।
एक बच्चा
राख के ढेर के पास बैठा
अपनी उंगलियों से
कुछ बना रहा था—
शायद घर
या शायद वही मंदिर।
वह अज्ञात
उसे देखता रहा
काफी देर तक,
जैसे पहली बार
निर्माण को
विनाश के बाद समझ रहा हो।
“धपाक”
फिर से कहीं भीतर हुआ—
इस बार बिना आवाज के।
उसे लगा
कि इलेक्ट्रॉन अब भी
प्रोटॉन तक पहुँचने की कोशिश में हैं
पर दूरी
पहले से थोड़ी और बढ़ गई है।
या शायद
वे मिल चुके हैं
और वही मिलन
यह सब बना रहा है।
उसने कदम आगे बढ़ाया
गीली सड़क पर
अपना एक निशान छोड़ा—
जो तुरंत ही
पानी में घुल गया।
जैसे
कोई कभी था ही नहीं।
पर फिर भी—
कहीं
किसी अदृश्य रजिस्टर में
वह दर्ज हो चुका था।
मंदिर अब नहीं था
पर उसकी परिक्रमा
अब भी चल रही थी
हर उस कण में
जो हवा में बचा रह गया था।
वह अज्ञात
अब भी चल रहा था—
बिना किसी दिशा के
पर शायद
पहली बार
किसी अर्थ की ओर।
और पीछे
राख के नीचे
कुछ हड्डियाँ
धीरे-धीरे
धूल में बदल रही थीं—
जैसे सृष्टि
फिर से
अपने पहले अक्षर लिख रही हो।
_____________________________________________