Hindi Quote in News by Sonu Kumar

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धनवापसी पासबूक क्या है? इससे कैसे देश की गरीबी खत्म हो जाएगी?
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धन वापसी पासबुक एक प्रस्तावित क़ानून है जो भारत के खनिज एवं प्राकृतिक संसाधनों की लूट रोकने के लिए लिखा गया है। इस कानून का मुख्य उद्देश्य खनिजो का राष्ट्रीयकरण करके इसे भारतीय नागरिको की संपत्ति घोषित करना है, ताकि भारत की रीढ़ की हड्डी टूटने से बचाया जा सके। इसका एक स्वत: प्रभाव यह भी होगा कि भुखमरी दूर होगी, और एक सीमा तक गरीबी में भी कमी आएगी।
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( गरीबी दूर करने के लिए धनवापसी के अलावा हमें पुलिस-अदालतें एवं टेक्स के क़ानून दुरुस्त करने के लिए जूरी कोर्ट एवं रिक्त भूमि कर लागू करने की भी जरूरत है, ताकि बड़े पैमाने पर छोटे एवं मझौले स्तर के कारखाने लगने का रास्ता साफ़ हो सके। )
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(1) खनिजो की लूट से क्या आशय है ?
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पिछले 400 वर्षो से खनिज ऐसा क्षेत्र में जिसमें भ्रष्टाचार कम और सीधी लूट ज्यादा है। खनिजो को लूटने वाला वर्ग इतना ज्यादा ताकतवर है कि इस लूट में छोटी मछलियों के आने की कोई गुंजाईश ही नहीं है। यहाँ लड़ाई सीधी शार्को के बीच है। उदारहण के लिए ईस्ट इण्डिया कम्पनी खनिज लूटने के धंधे में थी।
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पेड मीडिया के प्रायोजक यानी अमेरिकी-ब्रिटिश हथियार निर्माता पिछले 400 सालों से यह कारोबार कर रहे है। पहले उन्होंने निर्णायक हथियार बनाए और फिर उन्होंने माइनिंग कंपनियां भी खोली। आज भी खनन के बहुत सारे ऐसे क्षेत्र में जिसमें काफी आधुनिक मशीनरी का इस्तेमाल होता है। और ये मशीने सिर्फ कुछ गिनी चुनी कंपनियों को ही बनानी आती है। माइनिंग से बड़े पैमाने पैसा वही बना सकता है, या खनिज वही लूट सकता है जिसके पास ये मशीनरी हो।
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उदाहरण के लिए, तेल निकालने की तकनीक दुनिया में सिर्फ 25-30 कंपनियों के पास ही है। तो जिस कम्पनी को इन कम्पनियों के मालिक ये मशीनरी देते है, वही कम्पनी खनिज निकाल पाती है। प्रथम एवं द्वितीय विश्व युद्ध कोयले, कच्चा तेल और स्टील के लिए लड़ा गया। खाड़ी युद्ध भी कच्चे तेल के लिए हुआ था। ब्रिटिश-फ्रांसिस संघर्ष का कारण भी खनिज थे। अभी ईरान पर भी जो युद्ध आने वाला है, वह भी खनिज (तेल) के लिए है।
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डेमोक्रेसी आने से पहले तक पेड मीडिया की प्रायोजक (हथियार निर्माता) किसी देश के खनिज लूटने के लिए सीधे सेना का इस्तेमाल करते थे। डेमोक्रेसी आने के बाद वे पेड मीडिया एवं युद्ध की धमकी देकर पहले पीएम को कंट्रोल करते है और फिर कानूनी रूप से खनिज लूटते है। और जो पीएम खनिज बचाने के लिए जाएगा उसे अंततोगत्वा युद्ध में जाना पड़ेगा। कोई दया नहीं, कोई अपवाद नहीं !! दुसरे शब्दों में, खनिज को लेकर जो संघर्ष होता है, उसका निर्णय युद्ध से ही होता है।
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तो पेड मीडिया के प्रयोजको से सारा टकराव खनिजो की लूट को लेकर ही है। उन्हें खनिज लूटने है सिर्फ इसीलिए वे इतने बड़े मीडिया का खर्चा उठाते है, और उठा पाते है। यदि वे मुफ्त के खनिज नहीं लूट पाएंगे तो पेड मीडिया का घाटा भी नहीं उठा पायेंगे।
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उन्हें खनिज लूटने है इसीलिए वे राजनैतिक पार्टियों का खर्चा उठाते है, और उन्हें स्पोंसर करते है। उन्हें खनिज लूटने है इसीलिए उन्हें पीएम पर कंट्रोल चाहिए, जजों पर कंट्रोल चाहिए, पुलिस पर कंट्रोल चाहिए। उन्हें खनिज लूटने है, इसीलिए वे नागरिको को हथियार विहीन रखना चाहते है, और यह भी चाहते है कि अमुक देश अपने हथियारों का उत्पादन स्वयं न कर पाए। सार यह है कि सारी वैश्विक लड़ाई सिर्फ मुफ्त के खनिज एवं प्राकृतिक संसाधनों को लेकर है।
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स्टेंडर्ड ऑइल का उदाहरण देखिये। यह कम्पनी खनिज लूटने में अग्रणी कम्पनी रही है। ऑइल रिफायनिंग की इस कम्पनी को 1870 में रोकेफेलर ने बनाया था, और 1911 में इसे कई हिस्सों में विभाजित करके भंग कर दिया गया। 1910 तक दुनिया का 70% तेल यही कम्पनी खोद रही थी। आज भी दुनिया का 40% तेल इसी के कब्जे में है। हालांकि अब इस कम्पनी की सभी सबसिडरी कम्पनीयों को ट्रेक करने में आपको 2-3 घंटे गूगल करना पड़ेगा !! अम्बानी की रिफायनिंग स्टेंडर्ड ऑइल की सबसिड़री कम्पनी की मशीनों पर ही चलती है। और इसी तरह से ये कोयला, लोहा, ताम्बा से लेकर सभी महत्त्वपूर्ण खनिज खोदते है। Standard Oil - Wikipedia
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और मझौले स्तर पर मित्तल, वेदांता, टाटा, जिंदल से लेकर अम्बानी, बिरला अडानी तक ऐसे कई कारोबारी है तो खनिजो की लूट के धंधे में है।
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खनिजो की लूट इतने खुले तौर पर और इतनी सफाई से की जाती है, कि पूरे देश को मालूम ही नहीं होता कि किस पैमाने पर खनिज लूटे जा रहे है। पेड मीडिया इस बिंदु को टच ही नहीं करता। ज्यादा से ज्यादा वे स्थानीय स्तर पर हो रहे बजरी, पत्थर आदि चिल्लर किस्म के खनिजो का मुद्दा उठाते रहते है, ताकि बड़ी लूट को चर्चा से बाहर रखा जा सके।
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2019 में आवंटित की गयी कुछ कोयला खदानों का उदाहरण देखिये। निचे दिए गए आंकड़े भारत सरकार की अधिकृत वेबसाईट से लिए गए है — Coal Mine Allocation
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154 रू प्रति टन
156 रू प्रति टन
185 रू टन
230 रू प्रति टन
715 रू प्रति टन
755 रू प्रति टन
1100 रू प्रति टन
1230 रू प्रति टन
1674 रू प्रति टन
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दरों में इस तरह की भिन्नता क्यों ? 154 रुपये से 1674 रुपये !! लगभग 11 बार !!

एक वैध कारण यह है कि -- कोयले की गुणवत्ता में संभावित भिन्नता है। लेकिन यह एक मात्र कारण नहीं है।
दूसरा और वास्तविक कारण यह है कि - कई मामलों में गठजोड़ बनाकर नीलामी की शर्तों को इस तरह से ड्राफ्ट किया जाता है ताकि लक्षित कम्पनी को चिल्लर दामों में माइनिंग राइट्स दिए जा सके।
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इस कारण को समझने के लिए सलंग्न तस्वीर देखें — कोयला मंत्रालय की वेबसाईट बताती है कि, कोई भी बोली लगा सकता है, लेकिन साथ में उन्होंने यह शर्त भी जोड़ी है कि अंत में उनके पास स्टील या सीमेंट का संयंत्र होना चाहिए।
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तो प्रत्येक "खुली नीलामी" में इन शर्तों के अलावा भी वे ऐसी कई शर्तें जोड़ते है, जो कहती है कि यदि आपके पास संयंत्र हो तो इसे अमुक खदान से अमुक दूरी पर ही होना चाहिए !! और अमुक संयंत्र को इतनी उतनी क्षमता का होना चाहिए। तो अंत में सिर्फ वे कुछ बड़े खिलाड़ी ही बोली लगा सकेंगे जिन्हें लाभ देने के लिए यह शर्त जोड़ी गयी थी !! तो इस तरह वे कार्टेल बनाते हैं और कीमतों को कम बनाए रखते है। इसके अलावा, माइनिंग ब्लॉक का आकार इतना बड़ा रखा जाता है कि छोटे खिलाड़ी इसमें प्रतिभागी न बन सके।
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यदि हम क़ानून छापकर इस कार्टेल को तोड़ देते है तो ज्यादा प्रतिष्ठान बोली लगाने आयेंगे और हमें सभी खदानों के लिए 1600 रुपये प्रति टन के हिसाब से रॉयल्टी मिलेगी। धनवापसी पासबुक का क़ानून इसी तरह के गठजोड़ एवं कार्टेल बनाने की प्रक्रिया को तोड़ने के लिए लिखा गया है।
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अभी यहाँ से भ्रष्टाचार शुरू हुआ है। अगले स्तर का भ्रष्टाचार और भी व्यापक है। वे जितना खनिज निकालते है, उसका सिर्फ 10-20% ही रॉयल्टी चुकाते है। राइट्स लेने के बाद ज्यादातर खनिज अवैध रूप से निकाल लिया जाता है। इसकी कहीं एंट्री नहीं होती, और इसीलिए उन्हें रॉयल्टी भी नहीं चुकानी पड़ती !! वे सीधे मंत्रियो / जजों आदि को हफ्ता पहुंचा देते है, और मंत्रियो का आदेश आने के बाद कोई खनिज अधिकारी उनकी माइंस को सुपरवाइज करने कभी नहीं जाता !! तो उन्हें जितने इलाके की माइंस मिलती है वे उससे 5 गुना ज्यादा अतिक्रमण करके खनिज निकालते है।
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उदाहरण के लिए जिंदल को 2010 में भीलवाड़ा में माइंस आवंटित हुयी थी। और जिंदल ने सभी नियमों की धज्जियाँ उड़ा कर खनिज निकाले। माइंस से लगे हुए कस्बे (पुर) की हालत यह है कि वहां के नागरिको को कस्बे से पलायन करना पड़ा। लगभग 300-400 मकान इस हद तक क्षतिग्रस्त हो चुके है कि उन्हें अपने मकान छोड़कर अन्य जगहों पर किराए पर रहना पड़ रहा है।
NGT takes Jindal Saw's Bhilwara unit to task for non-compliance | Jaipur News - Times of India
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पिछले 7 साल से भीलवाड़ा में जिंदल को भगाने का अभियान चल रहा है। बार बार धरने, प्रदर्शन, जुलुस, ज्ञापन वगेरह होते है, किन्तु खनन जारी रहता है। सभी पेड मीडिया पार्टियों के नेता समय समय पर जिंदल के खिलाफ प्रदर्शन का ड्रामा करते रहते है।
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ड्रामा इसीलिए क्योंकि पेड मीडिया पार्टियो के ये सभी नेता खनिजो की इस लूट को रोकने के लिए आवश्यक क़ानून का विरोध करते है। यदि पेड मीडिया पार्टियों के नेता धन वापसी पासबुक क़ानून को गेजेट में छापने की मांग करेंगे तो पहला नुकसान यह होगा कि पेड मीडिया इन्हें कवरेज देना बंद कर देगा, और दूसरा नुकसान यह होगा कि, जिंदल उन्हें चंदा / घूस देना बंद कर देगा। तो ड्राफ्ट विहीन मांग को लेकर जनहित याचिकाओ एवं हवाई विरोध प्रदर्शन के ड्रामें चलते रहते है। और भीलवाड़ा में समाधान को टालने के लिए समस्या उठाने का यह ड्रामा पिछले 7 वर्षो से चल रहा है !!
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और भारत में इस तरह की हजारो ( हाँ, सैकड़ो नहीं हजारो) माइंस है, जहाँ इसी तरह की लूट चल रही है। इस लूट का कोई हिसाब-किताब लेखा जोखा नहीं। औसतन 100 रू के खनिज 20 रू में खोद लिए जाते है। तो यहाँ भ्रष्टाचार नहीं है, सीधी लूट है।
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उदाहरण के लिए जब ब्रिटिश भारत से गए तो टाटा को कई सारे माइनिंग राइट्स फ्री में देकर गए थे, और उनमें से एक माइंस की खबर सामने आने में 70 साल लग गए। टाटा के पास झारखण्ड में 25 पैसे एकड़ के हिसाब से कोयला खोदने के राइट्स है !! मतलब वह साल का 1 रूपया चुकाता है, और मर्जी पड़े जितना कोयला निकालता है। आज तक भारत में एक भी प्रधानमंत्री की हिम्मत नहीं हुई कि वह टाटा को नोटिस भेजकर 25 पैसे की जगह 50 पैसे कर सके !! बाजार भाव की तो बात ही भूल जाइए !! ( बाजार भाव 1500 से 2000 रू टन है )
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सारी निर्माण इकाइयां, कारखाने, औद्योगिक विकास आदि कच्चे माल की सस्ती उपलब्धता पर निर्भर करता है। दुर्भाग्य से भारत में खनिजो की पहले से कमी है। इसी खनिज को लूटने के लिए ब्रिटिश-फ़्रांसिस साम्राज्य भारत में आये। जब भारत आजाद हुआ तो नागरिको ने यह मांग की थी कि भारत के प्राकृतिक संसाधनों को भारत के समस्त नागरिको की संपत्ति घोषित करो। किन्तु जिन लोगो के हाथ में सत्ता आयी थी वे नागरिको की इस संयुक्त संपत्ति को खुद के कब्जे में रखना चाहते थे। अत: उन्होंने इन संसाधनों को सरकारी अधिकार में ले लिया।
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और आज सरकारे जो खनिज एवं प्राकृतिक संसाधन लुटा रही है, वह भारत के समस्त नागरिक की संपत्ति है। यदि हमारे पूर्वजो ने अंग्रेजो से लोहा लेकर उन्हें यहाँ से नहीं भगाया होता तो यह संपत्ति बचती नहीं थी।
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यदि भारत के नागरिक यह क़ानून लाने में सफल नहीं होते है तो जल्दी ही भारत के खनिज एवं प्राकृतिक संसाधन (प्राकृतिक संसाधन में जमीन स्पेक्ट्रम आदि भी शामिल है) लूट लिए जायेंगे। और यदि एक बार हमने प्राकृतिक संसाधन गँवा दिए तो भारत औद्योगिक विकास के लिए हमेशा के लिए परजीवी हो जाएगा। क्योंकि जो देश कच्चे माल के लिए आयात पर निर्भर हो जाता है उसकी रीढ़ हमेशा के लिए टूट जाती है। धनवापसी क़ानून इस लूट को रोक देगा।
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(2) समाधान - प्रस्तावित धनवापसी पासबुक
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इस क़ानून का सार : इस प्रस्तावित क़ानून के गेजेट में छपने के तुरंत बाद भारत सरकार के नियंत्रण में मौजूद सभी खनिज एवं प्राकृतिक संसाधन देश के नागरिको की संपत्ति घोषित हो जायेंगे, और देश के समस्त खनिज+स्पेक्ट्रम+सरकारी भूमि से प्राप्त होने वाली रॉयल्टी एवं किराया 135 करोड़ भारतीयों का संयुक्त खाता नामक बैंक एकाउंट में जमा होगा। इकट्ठा हुयी इस राशि का 65% हिस्सा हर महीने सभी भारतीयों में बराबर बांटा जाएगा और 35% हिस्सा सेना के खाते में जाएगा।
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खनिजो की नीलामी करके पैसा इकठ्ठा करने वाला राष्ट्रिय खनिज रॉयल्टी अधिकारी धन वापसी पासबुक में दायरे में होगा और नागरिक पटवारी कार्यालय में जाकर उसे नौकरी से निकालने के लिए अपनी स्वीकृति दे सकेंगे। यदि खनिज अधिकारी या उसके स्टाफ के खिलाफ घपला करने की या अन्य कोई शिकायत आती है तो सुनवाई करने और दंड देने की शक्ति जज के पास न होकर आम नागरिको की जूरी के पास रहेगी। यह क़ानून देश की सभी खदानों की बिक्री पर प्रतिबंध लगाता है।
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इस क़ानून को संसद से पास करने की जरूरत नही है। प्रधानमंत्री इसे सीधे गेजेट में छाप सकते है।
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(1) इस क़ानून के गेजेट में छपने के 30 दिनों के भीतर प्रत्येक मतदाता को एक धनवापसी पासबुक मिलेगी। तब भारत की केंद्र सरकार को होने वाली खनिज रॉयल्टी, स्पेक्ट्रम रॉयल्टी और केंद्र सरकार द्वारा अधिगृहीत जमीनों के किराये से प्राप्त राशि का 65% हिस्सा भारत के नागरिकों में समान रूप से बांटा जायेगा, और हर महीने यह धनराशि सीधे आपके बैंक खाते में जमा होगी। शेष 35% हिस्से का उपयोग सिर्फ सेना में सुधार के लिए खर्च होगा। जब आप राशि प्राप्त करेंगे तो इसकी एंट्री धन वापसी पासबुक में आएगी।
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(2) यह कानून ऐसा कोई वादा नहीं करता कि आपको प्रति महीने 500 रू या 1000 रू या कोई स्थिर राशि प्राप्त होगी। यदि खनिजों / स्पेक्ट्रम का या जमीनों का बाजार मूल्य बढ़ता है तो आमदनी और किराया बढ़ सकता है। लेकिन यदि खनिज आमदनी और किराया घटता है तो नागरिकों को हर महीने मिलने वाली यह राशि भी घटेगी।
स्पष्टीकरण : खनिज रॉयल्टी के रूप में मिलने वाली यह राशि सरकार की तरफ से दिया गया अनुदान या सहायता नहीं है। चूंकि, देश के खनिज संसाधनों पर देश के सभी नागरिको का बराबर हक़ है अत: यह राशि सभी भारतीयों को बराबर मिलेगी, और सरकार गरीब-अमीर के आधार पर इसके वितरण पर ऐसा कोई नियम नहीं लगाएगी, जिससे गरीब आदमी को ज्यादा हिस्सा एवं अमीर आदमी कम पैसा मिले। किन्तु यदि प्रधानमंत्री प्रस्तावित टू चाइल्ड पालिसी क़ानून गेजेट में छाप देते है तो टू चाइल्ड पालिसी के ड्राफ्ट में दिए गए निर्देशों के अनुसार संतानों की संख्या के आधार पर नागरिको को प्रति माह प्राप्त होने वाली खनिज रोयल्टी में कटौती / बढ़ोतरी होगी।
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(3) राष्ट्रीय सम्पत्तियों पर नागरिको के स्वामित्व की घोषणा : भारत के नागरिक देश की सभी खदानों, स्पेक्ट्रम, IIM अहमदाबाद को शामिल करते हुए सभी IIM के भू-खंडो, जेएनयू के भू-खंडो, यूजीसी द्वारा पोषित सभी विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों जिनका स्वामित्व निजी कंपनियों या ट्रस्टो के पास नहीं है, के भू-खंडो को संयुक्त और समान रूप से भारतीय नागरिकों के स्वामित्व की संपत्ति घोषित करते है। अब से ये भू-खंड भारत की राज्य सरकार या भारत की केंद्र सरकार या किसी अन्य सरकारी पक्ष या निजी पक्ष की संपत्ति नहीं है। भारत के सभी अधिकारीयों, प्रधानमंत्री, हाई कोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीशो से विनती की जाती है कि, भारत के नागरिको के उपरोक्त फैसले के विरुद्ध कोई भी याचिका स्वीकार ना करे।
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निम्नलिखित मंत्रालयों और विभागों के सभी भू-खंड राष्ट्रीय खनिज अधिकारी के क्षेत्राधिकार में आयेंगे :

विज्ञान-चिकित्सा-गणित-इंजीनियरिंग को छोड़कर IIM, UGC द्वारा पोषित सभी विश्वविद्यालय व महाविद्यालय
एयरपोर्ट, एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइन्स के स्वामित्व वाले सभी भवन
पर्यटन एवं संस्कृति मंत्रालय
उपभोक्ता मामलें एवं लोक वितरण मंत्रालय
सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय
लघु उद्योग एवं कृषि एवं ग्राम उद्योग मंत्रालय
कपड़ा उद्योग मंत्रालय
युवा मामलें और खेल मंत्रालय
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय
मानव संसाधन विकास मंत्रालय
ग्रामीण विकास मंत्रालय
सामाजिक न्याय एवं सशक्तिकरण मंत्रालय
शहरी विकास एवं गरीबी उपशमन मंत्रालय
राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग एवं नीति आयोग
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(4) राष्ट्रीय खनिज रॉयल्टी अधिकारी का निजी व्यक्तियों, कंपनियों, ट्रस्टों, राज्य सरकारो एवं नगर/ जिला शासन के स्वामित्व वाले भू-खण्डों, सेना, न्यायालयों, जेलों, रेलवे, बस स्टेशनों, कक्षा 12 तक के सरकारी विद्यालयों और कर संग्रहण कार्यालयों द्वारा उपयोग में लिए जा रहे भू-खण्डों पर कोई अधिकार नहीं होगा।
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(5) खनिज रॉयल्टी अधिकारी 1947 से पहले एवं बाद में लीज पर दी गयी सभी लीज शुदा खदानों की लीज का बाजार भाव से पुनर्मूल्यांकन करके तय करेगा कि क्या अमुक खदान की रॉयल्टी राशि बढ़ाई जानी चाहिए या नहीं। देश की अन्य सभी खदानों, कच्चे तेल के कुओ आदि से होने वाली आय भी NMRO प्राप्त करेगा।
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#DhanVapsiPassbook का सारांश समाप्त
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धनवापसी पासबुक का पूरा क़ानून यहाँ देखें -
Facebook.com/pawan.jury/posts/2212549868863237

Hindi News by Sonu Kumar : 112019404
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