ऋगुवेद सूक्ति-- (३८) की व्याख्या
"भियं दधाना हृदयेषु शत्रु;न:"
ऋगुवेद--
१०/८४/७
भाव--शत्रु के हृदय में भय उत्पन्न कर दो।
भियं दधाना हृदयेषु शत्रूणाम्।
शाब्दिक अर्थ--
भियम् — भय
दधाना — धारण करते हुए / उत्पन्न करते हुए
हृदयेषु — हृदयों में
शत्रूणाम् — शत्रुओं के
भावार्थ--
हे दिव्य शक्ति! शत्रुओं के हृदयों में भय उत्पन्न कर दो, जिससे वे दुष्ट कर्म करने का साहस न कर सकें और उनका अहंकार व आक्रमण समाप्त हो जाए।
संक्षिप्त व्याख्या--
इस मन्त्र में देवशक्ति से प्रार्थना की गई है कि अन्यायी और दुष्ट प्रवृत्ति वाले शत्रुओं के मन में ऐसा भय उत्पन्न हो जाए कि वे अधर्म और हिंसा का मार्ग छोड़ दें। इसका उद्देश्य केवल भय पैदा करना नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा और अधर्म के निरोध की भावना है।वेदों में शत्रु के हृदय में भय उत्पन्न होने या दुष्टों के भयभीत होने की भावना कई स्थानों पर मिलती है। कुछ प्रमुख वैदिक प्रमाण इस प्रकार हैं—
१. ऋग्वेद--
भियं दधाना हृदयेषु शत्रूणाम्।
— ऋग्वेद-१०/८४/७
भावार्थ — हे देवशक्ति! शत्रुओं के हृदय में भय उत्पन्न कर दो।
२. ऋग्वेद--
इन्द्रः शत्रूणां हृदयानि कम्पयति।
— ऋग्वेद-१/८०/१३
भावार्थ — इन्द्र शत्रुओं के हृदयों को कम्पित (भयभीत) कर देते हैं।
३. ऋग्वेद--
त्वं न इन्द्राभिभूरसि त्वं शत्रूञ्जिघांससि।
— ऋग्वेद,-१/५१/५
भावार्थ — हे इन्द्र! आप शत्रुओं पर विजय प्राप्त करते हैं और उन्हें पराजित करते हैं।
४. अथर्ववेद--
यथा वृक्षान् वातो भिनत्ति तथा शत्रून् भिनद्मि।
— अथर्ववेद-६/७५/१
भावार्थ — जैसे वायु वृक्षों को हिला देती है, वैसे ही शत्रुओं को पराजित किया जाए।
. अथर्ववेद--
भयं नो अस्तु शत्रुभ्यः।
— अथर्ववेद-१९/१५/६
भावार्थ — शत्रुओं को भय हो, हमें नहीं।
निष्कर्ष--
वेदों में बार-बार यह प्रार्थना मिलती है कि धर्म की रक्षा के लिए दुष्ट या आक्रमणकारी शत्रुओं के मन में भय उत्पन्न हो, जिससे वे अधर्म और हिंसा से दूर हो जाएँ।
उपनिषदों में प्रमाण--
१. कठोपनिषद--
भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यः।
भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः॥
— कठोपनिषद-२/३/३
भावार्थ — उसी परमात्मा के भय से अग्नि तपती है, सूर्य प्रकाश देता है, इन्द्र और वायु कार्य करते हैं तथा मृत्यु भी अपना कार्य करती है।
२. तैत्तिरीयोपनिषद--
भयाद्वातः पवते भयादेति सूर्यः।
भयादग्निश्चेन्द्रश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः॥
— तैत्तिरीयोपनिषद-२/८
भावार्थ — परम ब्रह्म के भय से ही वायु चलती है, सूर्य उदित होता है, अग्नि और इन्द्र अपना कार्य करते हैं तथा मृत्यु भी अपना कार्य करती है।
३. बृहदारण्यकोपनिषद-
द्वितीयाद्वै भयं भवति।
— बृहदारण्यक उपनिषद-१/४/२
भावार्थ — जहाँ द्वैत (दूसरापन) होता है वहीं भय उत्पन्न होता है।
4. मुण्डकोपनिषद--
भयादस्याग्निस्तपति सूर्यस्तपति।
— मुण्डकोपनिषद-२/१/४
भावार्थ — परमात्मा की महाशक्ति से ही अग्नि और सूर्य अपना कार्य करते हैं।
५ श्वेताश्वतर उपनिषद--
भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यः।
भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः॥
— श्वेताश्वतर उपनिषद-६/२
भावार्थ — उसी परमेश्वर के भय से अग्नि तपती है, सूर्य प्रकाश देता है, इन्द्र और वायु अपना कार्य करते हैं तथा मृत्यु भी अपना कार्य करती है।
६- मैत्रायणी (मैत्री) उपनिषद--
महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति।
— मैत्रायणी उपनिषद-६/३०
भावार्थ — यह ब्रह्म महान् भय के समान (वज्र के समान प्रभावशाली) है; जो उसे जान लेते हैं वे अमर हो जाते हैं।
७- कैवल्य उपनिषद--
सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
भावार्थ — जब साधक सभी प्राणियों में आत्मा को और आत्मा में सभी प्राणियों को देखता है, तब उसके लिए भय समाप्त हो जाता है।
८. अमृतबिन्दु उपनिषद--
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।
भावार्थ — मनुष्य के बन्धन और भय का कारण भी मन है और मुक्ति का कारण भी मन ही है।
निष्कर्ष--
उपनिषदों में यह बताया गया है कि—परम ब्रह्म की महाशक्ति से समस्त जगत अनुशासन में चलता है।ब्रह्म को जानने से भय समाप्त हो जाता है। अज्ञान और द्वैत से ही भय उत्पन्न होता है। हैं। जुड़ी है।
पुराणों में भी दुष्टों के हृदय में भय उत्पन्न होने अथवा अधर्मियों के भयभीत होने का उल्लेख अनेक स्थानों पर मिलता है। कुछ प्रमुख प्रमाण इस प्रकार हैं—
१. विष्णु पुराण--
भयं द्वितीयाभिनिवेशतः स्यात्।
— विष्णु पुराण-१/२/६
भावार्थ — जब जीव परमात्मा से अलग दूसरे में आसक्ति करता है तब भय उत्पन्न होता है।
२. अग्नि पुराण--
दुष्टानां हृदये नित्यं भयमेव प्रवर्तते।
भावार्थ — दुष्ट लोगों के हृदय में सदा भय बना रहता है।
३. गरुड़ पुराण--
पापानां फलमाप्नोति भयशोकसमन्वितम्।
भावार्थ — पाप करने वाले मनुष्य को भय और शोक से युक्त फल प्राप्त होता है।
४. मार्कण्डेय पुराण--
देवीभयात् पलायन्ते दानवा दारुणा रणात्।
भावार्थ — देवी के भय से दानव युद्धभूमि से भाग जाते हैं।
५- विष्णु पुराण--
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। (भाव समान सिद्धान्त)
— विष्णु पुराण-४/२४
भावार्थ — जब-जब धर्म की हानि होती है तब भगवान अधर्मियों का नाश करने के लिए प्रकट होते हैं, जिससे दुष्ट भयभीत होते हैं।
६- लिंग पुराण--
तस्य नामभयाद् दैत्याः पलायन्ते दिशो दश।
भावार्थ — भगवान के नाम के भय से दैत्य दसों दिशाओं में भाग जाते हैं।
७. स्कन्द पुराण--
धर्मे स्थितानां न भयं कदाचन।
भावार्थ — जो लोग धर्म में स्थित रहते हैं उन्हें किसी प्रकार का भय नहीं होता।
निष्कर्ष--
पुराणों में यह सिद्धान्त बार-बार बताया गया है कि—
ईश्वर से विमुखता और अधर्म से भय उत्पन्न होता है।
भगवान या दिव्य शक्ति के प्रभाव से दुष्ट और दैत्य भयभीत हो जाते हैं। धर्म में स्थित व्यक्ति निर्भय रहता है।
भगवद्गीता में प्रमाण--
१.अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।
— गीता-१६/१
भावार्थ — निर्भयता, अन्तःकरण की शुद्धि और ज्ञानयोग में स्थित रहना—ये दैवी गुण हैं।
२.दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥
— गीता-२/५६
भावार्थ — जो मनुष्य राग, भय और क्रोध से रहित है और सुख-दुःख में सम रहता है, वही स्थिरबुद्धि मुनि कहलाता है।
३.वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः।
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः॥
— गीता-४/१०
भावार्थ — राग, भय और क्रोध से रहित होकर अनेक लोग ज्ञान और तप से शुद्ध होकर मेरे स्वरूप को प्राप्त हुए हैं।
४.परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥
— गीता-४/८
भावार्थ — साधुओं की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए भगवान युग-युग में अवतार लेते हैं।
निष्कर्ष--
गीता में बताया गया है कि—
धर्म और आत्मज्ञान से निर्भयता प्राप्त होती है।
राग, भय और क्रोध का त्याग करना आध्यात्मिक उन्नति का लक्षण है।
भगवान अधर्मियों का नाश करते हैं, जिससे दुष्ट प्रवृत्तियाँ नष्ट होती हैं।
महाभारत में प्रमाण --
१.अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम।
— अनुशासन पर्व, अध्याय-११६ , श्लोक-३७
भावार्थ — मैं सभी प्राणियों को अभय (निर्भयता) देता हूँ; यह मेरा व्रत है।
२-. न भयमस्ति धर्मिष्ठे न सत्ये न कृतात्मनि।
— शान्ति पर्व, अध्याय-१६२
भावार्थ — जो धर्मनिष्ठ, सत्यवादी और आत्मसंयमी है उसे किसी प्रकार का भय नहीं होता।
३. यत्र धर्मस्तत्र जयः।
— महाभारत का प्रसिद्ध सिद्धान्त
भावार्थ — जहाँ धर्म है, वहीं विजय होती है; इसलिए धर्मात्मा को भय नहीं होता।
४.धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
— वन पर्व (नीति वचन)
भावार्थ — धर्म का नाश करने वाला स्वयं नष्ट हो जाता है, और जो धर्म की रक्षा करता है धर्म उसकी रक्षा करता है।
निष्कर्ष--
महाभारत में यह स्पष्ट बताया गया है कि—धर्म का पालन करने वाला व्यक्ति निर्भय रहता है।
अधर्मी और अन्यायी अंततः भय और विनाश को प्राप्त होते हैं।
धर्म ही मनुष्य की रक्षा करता है और विजय दिलाता है।
स्मृति ग्रन्थों में प्रमाण --
१-. मनुस्मृति
भयाद् भोगाय कल्पन्ते सर्वे लोकाः स्वकर्मभिः।
— मनुस्मृति-७/१५
(दण्ड-नीति प्रसंग)
भावार्थ — दण्ड के भय से ही सभी लोग अपने-अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं।
२. मनुस्मृति
दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति।
दण्डः सुप्तेषु जागर्ति दण्डं धर्मं विदुर्बुधाः॥
— मनुस्मृति-७/१८
भावार्थ — दण्ड ही समस्त प्रजा को अनुशासित करता है, वही उनकी रक्षा करता है; सबके सो जाने पर भी दण्ड जागता रहता है, इसलिए विद्वान दण्ड को ही धर्म का रक्षक मानते हैं।
३. याज्ञवल्क्य स्मृति
दण्डो हि शासनो लोकस्य दण्ड एवाभिरक्षकः।
— याज्ञवल्क्य स्मृति-१/३६६
भावार्थ — दण्ड ही लोक का शासन करने वाला और उसकी रक्षा करने वाला है।
४- नारद स्मृति
दण्डभयात् प्रवर्तन्ते सर्वे धर्मेषु मानवाः।
भावार्थ — दण्ड के भय से ही मनुष्य धर्म के मार्ग पर चलते हैं।
५- बृहस्पति स्मृति
दण्डभयात् प्रवर्तन्ते सर्वे धर्मेषु मानवाः।
भावार्थ — दण्ड के भय से ही मनुष्य धर्म के मार्ग में प्रवृत्त होते हैं।
६- पराशर स्मृति
दण्डो हि शासनो लोके दण्ड एवाभिरक्षकः।
भावार्थ — दण्ड ही संसार का शासन करने वाला और उसकी रक्षा करने वाला है।
७- कात्यायन स्मृति-
दण्डभयेन लोकस्य सर्वं भवति शासितम्।
भावार्थ — दण्ड के भय से ही समस्त समाज अनुशासन में रहता है।
८- आपस्तम्ब धर्मसूत्र
धर्मेण शासितो लोको न भयेन प्रमाद्यति।
भावार्थ — जब समाज धर्म से संचालित होता है, तब भय से उत्पन्न अव्यवस्था नहीं होती।
निष्कर्ष--
अन्य स्मृतियों और धर्मसूत्रों में भी यह सिद्धान्त स्पष्ट है कि—
दण्ड का भय समाज को अनुशासित रखता है।
अधर्मी और अपराधी भय से नियंत्रित होते हैं।
धर्म और न्याय की रक्षा के लिए दण्ड व्यवस्था आवश्यक मानी गई है।
नीति ग्रन्थों में प्रमाण--
१. चाणक्य नीति
तावद्भयस्य भेतव्यं यावद्भयमनागतम्।
आगतं तु भयं दृष्ट्वा प्रहर्तव्यमशङ्कया॥
— चाणक्य नीति, अध्याय-५ , श्लोक-१७
भावार्थ — भय आने से पहले तक उससे सावधान रहना चाहिए, परन्तु जब भय सामने आ जाए तो बिना संकोच उसका सामना करना चाहिए।
२. भर्तृहरि नीति शतक
भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताः
तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः।
कालो न यातो वयमेव याता
स्तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः॥
— नीतिशतक, श्लोक -७
भावार्थ — भोग हमने नहीं भोगे बल्कि हम ही भोगों से नष्ट हुए; समय नहीं बीता बल्कि हम ही बीत गए।
३. विदुर नीति (महाभारत, उद्योग पर्व)
न देवा दण्डमादाय रक्षन्ति पशुपालवत्।
यं तु रक्षितुमिच्छन्ति बुद्ध्या संविभजन्ति तम्॥
— उद्योग पर्व, अध्याय-३३
भावार्थ — देवता हाथ में दण्ड लेकर रक्षा नहीं करते; जिसकी रक्षा करना चाहते हैं उसे बुद्धि प्रदान करते हैं।
४. शुक्र नीति
दण्डेन शास्यते लोको दण्ड एवाभिरक्षकः।
भावार्थ — दण्ड से ही संसार शासित होता है और वही उसकी रक्षा करता है।
निष्कर्ष--
नीति ग्रन्थों में यह सिद्धान्त बताया गया है कि—
भय का सामना साहस से करना चाहिए।
दण्ड और अनुशासन से समाज व्यवस्थित रहता है।
बुद्धि, नीति और धर्म से ही मनुष्य निर्भय जीवन जीता है।
१. वाल्मीकि रामायण
भयेषु चाभयदातारं दातारं सर्वसम्पदाम्।
— अयोध्याकाण्ड, सर्ग २, श्लोक २६
भावार्थ — श्रीराम भय के समय सबको अभय देने वाले और सभी प्रकार की सम्पत्तियों के दाता हैं।
२. वाल्मीकि रामायण
रक्षिता जीवलोकस्य धर्मस्य परिरक्षिता।
— अयोध्याकाण्ड, सर्ग १, श्लोक ३९
भावार्थ — श्रीराम समस्त प्राणियों के रक्षक और धर्म की रक्षा करने वाले हैं, इसलिए अधर्मी उनसे भयभीत रहते हैं।
३. अध्यात्म रामायण
भयं त्यजस्व काकुत्स्थ रक्षिता तेऽस्मि सर्वदा।
— अरण्यकाण्ड, अध्याय ३
भावार्थ — भय का त्याग करो, मैं सदा तुम्हारी रक्षा करने वाला हूँ।
४. गर्ग संहिता
भयभीता द्रुतं यान्ति दैत्याः कृष्णस्य तेजसा।
भावार्थ — भगवान श्रीकृष्ण के तेज से दैत्य भयभीत होकर शीघ्र भाग जाते हैं।
निष्कर्ष--
रामायण और गर्ग संहिता में यह बताया गया है कि—
भगवान धर्मात्माओं को अभय देते हैं।
अधर्मी और दुष्ट उनके तेज और शक्ति से भयभीत हो जाते हैं।
दिव्य शक्ति धर्म की रक्षा और अधर्म के नाश के लिए प्रकट होती सकता है।
१. हितोपदेश
भयाद् धावति लोकः सर्वः।
भावार्थ — भय के कारण ही लोग अनेक अनुचित कर्मों से रुक जाते हैं और अनुशासन बना रहता है।
२. पंचतंत्र
भयेन भेद्यते सर्वं न च भेद्यं अभयेन हि।
भावार्थ — भय से अनेक कार्य सिद्ध हो जाते हैं, परन्तु जहाँ भय नहीं होता वहाँ नियंत्रण कठिन हो जाता है।
३. योग वशिष्ठ
चित्तमेव हि संसारो रागादिदोषदूषितम्।
तदेव तैर् विनिर्मुक्तं भवत्येव निरामयम्॥
भावार्थ — रागादि दोषों से दूषित चित्त ही संसार और भय का कारण है; जब वही चित्त उनसे मुक्त हो जाता है तब शान्त और निर्भय हो जाता है।
४. योग वशिष्ठ
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः। (भाव समान सिद्धान्त)
भावार्थ — मन ही मनुष्य के बन्धन, भय और मोक्ष का कारण है।
निष्कर्ष--
हितोपदेश, पंचतंत्र और योग वशिष्ठ में यह बताया गया है कि—
भय से समाज में अनुशासन और सावधानी उत्पन्न होती है।
मन ही भय और बन्धन का मूल कारण है।
जब मन शुद्ध और विवेकयुक्त हो जाता है तब मनुष्य निर्भय हो जाता है।
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