जान से कैसा प्यार होगा।
जिसे ख़ुद पर ही ऐतबार न होगा,
जान से कैसा प्यार होगा।
जो हर रिश्ते में नाप–तौल करे,
उसका जज़्बा ही उधार होगा।
लब हँसेंगे, आँख नम रहेगी,
ये भी कोई इज़हार होगा?
जो वक़्त पे साथ न दे सके,
वो भला कैसा यार होगा।
दर्द से भागे जो हर मोड़ पर,
उसे क्या वफ़ा का भार होगा।
सिर्फ़ बातें हों, क़ुर्बानी न हो,
तो हर रिश्ता बेकार होगा।
प्रसंग, जो सब दाँव पर रख देता है,
उसी का सच स्वीकार होगा।
"प्रसंग"
प्रणयराज रणवीर