ॐ नमः शिवाय
मार्च : ध्रुवीकरण और निर्णायक परिवर्तन का महीना
शास्त्रीय एवं समकालीन ज्योतिषीय दृष्टि
मार्च एक तनावपूर्ण और अत्यधिक ध्रुवीकृत महीना बनकर उभरता है, क्योंकि सभी दृश्य ग्रह राहु–केतु अक्ष के एक ओर संकेंद्रित हैं।
कुंभ राशि में राहु के साथ मंगल और वक्री बुध का संयोग अशांति, भ्रांति, गलत सूचना तथा मानसिक अस्थिरता को जन्म देता है, वहीं मीन राशि में शनि–नेपच्यून का दीर्घकालीन संयोग उन आदर्शों और विश्वास प्रणालियों को घोल रहा है जिन पर अब निर्भर नहीं किया जा सकता।
शास्त्र कहते हैं:
“राहु–मंगलयुति: क्रोध-विवाद-विनाशकारी।”
(राहु और मंगल का योग क्रोध, संघर्ष और विनाश उत्पन्न करता है।) — सारावली
“बुधयुक्तो राहुर्मोहं वादं च वर्धयेत्।”
(बुध के साथ राहु भ्रम और मिथ्या वाणी को बढ़ाता है।) — फलदीपिका
इस उग्र वातावरण में एक संतुलनकारी शक्ति है—मीन राशि में उच्च का शुक्र, जो करुणा, कला और भावनात्मक सहारा प्रदान करता है।
“उच्चे शुक्रः सुख-भोग-कला-प्रदः।”
(उच्च का शुक्र सौंदर्य, आनंद और कलात्मक संवेदना देता है।) — बृहत् पराशर होरा शास्त्र
इसी समय गुरु का मार्गी होना विवेक और दृष्टि को धीरे-धीरे पुनः जाग्रत करता है।
“गुरुः मार्गे ज्ञान-विवेकं वर्धयेत्।”
(गुरु के मार्गी होने से ज्ञान और विवेक बढ़ता है।) — फलदीपिका
मीन राशि में शुक्र (1–25 मार्च)
शुक्र अपनी उच्च राशि मीन में स्थित होकर इस महीने का मुख्य स्थिरकारी ग्रह बनता है। शनि–नेपच्यून के प्रभाव क्षेत्र से गुजरते हुए भी यह करुणा, भक्ति, कला और आध्यात्मिक संवेदनशीलता प्रदान करता है।
“शुक्रः मीने उच्चस्थो भवति करुणा-भक्ति-कला-प्रदः।”
(मीन में उच्च का शुक्र करुणा, भक्ति और कला प्रदान करता है।) — सारावली
किन्तु शास्त्र चेतावनी देते हैं—
“शुक्रः पापयुक्तः स्वप्न-व्यमोहं जनयेत्।”
(दुष्ट ग्रहों से युक्त शुक्र भ्रम और पलायन प्रवृत्ति उत्पन्न करता है।) — फलदीपिका
अतः यह काल सहानुभूति का है, पर अति-आदर्शवाद से बचने का भी।
सिंह राशि में पूर्णिमा — पूर्ण चंद्रग्रहण (3 मार्च)
यह पूर्ण चंद्रग्रहण नेतृत्व, सत्ता, प्रसिद्धि और अधिकार से जुड़े विषयों में निर्णायक मोड़ लाता है। केतु की संलग्नता किसी पुराने ढांचे के टूटने, परदाफाश और त्याग का संकेत देती है।
वराहमिहिर कहते हैं—
“ग्रहणं राज्ञां नाशं दर्शयेत्।”
(ग्रहण राजा और शासकों के पतन का संकेत देता है।) — बृहत् संहिता
“केतुसंयोगे छिन्नता त्याग-विनाशः।”
(केतु से जुड़ाव में कटाव और हानि होती है।) — सारावली
व्यक्तिगत स्तर पर यह आत्म-अभिव्यक्ति और अहंकार पर चिंतन का समय है। सामूहिक स्तर पर यह समूह-मानसिकता और दोषारोपण को बढ़ा सकता है। शास्त्र उपदेश देते हैं—
“ग्रहणे मौनं श्रेयस्करम्।”
(ग्रहण काल में मौन और संयम शुभ है।)
मिथुन राशि में गुरु मार्गी (11 मार्च)
गुरु का मार्गी होना दृष्टि की पुनर्स्थापना का संकेत है। मिथुन में गुरु सूचना, विचारधाराओं और कथाओं की पुनर्समीक्षा कराता है।
“गुरुः स्थिरः ज्ञान-विवेक-वर्धकः।”
(मार्गी गुरु विवेक और ज्ञान बढ़ाता है।) — बृहत् पराशर होरा शास्त्र
“बुधराशौ गुरुर्वाद-ज्ञान-विचार-कारकः।”
(मिथुन में गुरु ज्ञान और विमर्श को प्रोत्साहित करता है।) — फलदीपिका
यह स्पष्टता का नहीं, बल्कि समझ की ओर पहला कदम है।
राहु के साथ मंगल–बुध युति (13–15 मार्च)
यह माह का सबसे अस्थिर और उग्र योग है। आवेग, दुर्घटनाएँ, तकनीकी विफलता, अशांति और भ्रम की संभावनाएँ बढ़ती हैं।
“राहु-मंगलयोर्युतिः अग्नि-भयं कलहं तथा।”
(राहु-मंगल योग अग्नि, भय और कलह उत्पन्न करता है।) — बृहत् संहिता
“बुधयुक्ते राहौ मिथ्या-वार्ता प्रवर्तते।”
(बुध-राहु से झूठी खबरें फैलती हैं।) — सारावली
शास्त्र स्मरण कराते हैं—
“न बलेन, तु युक्त्या कार्यसिद्धिः।”
(कार्य बल से नहीं, बुद्धि से सिद्ध होता है।)
मीन राशि में सूर्य (14 मार्च – 12 अप्रैल)
सूर्य शनि–नेपच्यून से युक्त होकर नेतृत्व संकट और दिशा भ्रम को उजागर करता है।
“सूर्य-शनि युतिः राज्य-पीड़ा-कारी।”
(सूर्य-शनि योग शासकों को कष्ट देता है।) — फलदीपिका
“मीने सूर्यः त्याग-भावं जनयेत्।”
(मीन में सूर्य त्याग और आत्मचिंतन कराता है।) — सारावली
विषुव (20 मार्च)
यह प्रकाश और अंधकार का संतुलन बिंदु है।
“विषुवकाले भूलोक-परिवर्तनम्।”
(विषुव पर सांसारिक घटनाओं में परिवर्तन होता है।) — बृहत् संहिता
यह धीमे और सजग परिवर्तन का समय है।
ज़मीन अमावस्या — नव संवत्सर (19 मार्च)
संवत्सर : पराभव
पराभव संवत्सर सत्ता के पतन और संरचनात्मक गिरावट का सूचक माना गया है।
“पराभवे नृपाणां हानिः।”
(पराभव वर्ष में शासकों की हानि होती है।)
उत्तर भाद्रपदा नक्षत्र गंभीरता और वैराग्य देता है।
“उत्तरभाद्रपदे वैराग्यं गंभीरता च।”
यह एक मौन, गहन और आधारभूत पुनःआरंभ है।
“शनैः शनैः सर्वं भवति।”
(सभी परिवर्तन धीरे-धीरे होते हैं।) — मनुस्मृति
बुध मार्गी (21 मार्च)
बुध मार्गी होकर गति देता है, पर राहु से युति के कारण भ्रम शेष रहता है।
“बुधः राहुयुक्तः भ्रान्तिं जनयेत्।”
(बुध-राहु भ्रम उत्पन्न करते हैं।) — फलदीपिका
अतः—
“परीक्ष्य एव कर्तव्यम्।”
(जांच कर ही कार्य करें।) — हितोपदेश
निष्कर्ष:
मार्च कर्मफल, सत्ता-पतन और वैचारिक पुनर्संयोजन का महीना है। शास्त्र बताते हैं कि राहु-मंगल, ग्रहण और शनि-संयोग के काल विजय के नहीं, बल्कि विवेक के समय होते हैं। उच्च का शुक्र और मार्गी गुरु हमें करुणा और बुद्धि प्रदान करते हैं।
“कालः पचति भूतानि।”
(समय सब कुछ परिपक्व करता है।)
मार्च हमें प्रतिक्रिया नहीं, निरीक्षण; बल नहीं, समझ; और पुराने ढांचों से चिपके रहने के बजाय शांत, सच्चे नव-निर्माण की ओर ले जाता है।
आपका अपना
आचार्य दीपक सिक्का
संस्थापक ग्रह चाल कंसल्टेंसी