सुबह की धूप
खिड़की से झांकती धूप
कोई प्रश्न पूछती है मुझसे,
कि उजाला बाहर है
या भीतर कहीं थक कर बैठा है।
गौरैया का चहचहाना
समय की छोटी-सी सुई है,
जो हर सुबह याद दिलाती है—
जीवन अब भी चल रहा है,
भले ही हम ठहर गए हों।
ठंडी, मुलायम हवा
कानों से गुजरते हुए
कुछ कहती है,
पर शब्दों से नहीं—
शायद सिखाती है
कि हर बात को पकड़ना ज़रूरी नहीं।
चाय के प्याले में डूबता बिस्कुट
क्षणभंगुरता का पाठ है,
जो मीठा है वही गल भी जाता है,
और जो टिक जाए
वह अक्सर बेस्वाद हो जाता है।
हाथों पर तितलियों का स्पर्श
विश्वास जैसा है—
हल्का, अनिश्चित,
और ज़रा-सी हलचल में उड़ जाने वाला।
दूर पेड़ पर मुस्कुराता सबक फल
कहता है चुपचाप,
कि ज्ञान हमेशा पास नहीं उगता,
कभी-कभी
उसे दूर से ही स्वीकारना पड़ता है।
चौखट छूकर गुजरती पायल की रुनझुन
याद दिलाती है
कि घर केवल दीवारें नहीं,
वह ध्वनि है
जो लौटने का साहस देती है।
यादों में खोया मन
और हल्का होता तन,
जैसे जीवन स्वयं
अपने बोझ उतार रहा हो
मुझसे कुछ कहे बिना।
यह बेखबर, अनजान-सा समा
दरअसल एक दर्पण है,
जिसमें मैं ढूंढ रहा हूँ
सुकून का वह हिस्सा
जो कहीं खोया नहीं,
बस अपने ही ख्यालों में
मुझसे रूठ कर बैठा है।
उलझनों से भरा,
हृदय से थोड़ा दूर,
मर्म में अपने ही सवालों से
बंधा हुआ—
शायद सुकून कोई जगह नहीं,
एक स्वीकार है,
जो तभी मिलता है
जब हम स्वयं से
लड़ना छोड़ देते हैं।