Hindi Quote in Poem by Pawan Kumar Sharma

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बचपन यूँ ही बीत गया,

दूर खड़े लोगों को देखते हुए,

कुछ समझ में आया,

कुछ अधूरा ही रह गया।

कोई पास नहीं था

जिससे खिलौने के लिए ज़िद करता,

कोई ऐसा नहीं

जिसे “सबसे अपना” कह पाता।

स्वप्नलोक में रहना आदत बन गया,

और वही आदत ताउम्र साथ चलती रही।

कभी किसी को मुझ पर तरस आया,

कभी किसी ने गोद में उठा लिया,

पर अपने ही वज़न की गोद में

मैं हर बार हल्का-सा निराश हो गया।

तभी शायद

मैंने खुद को ही अपना सहारा बना लिया।

जो दूसरों के लिए बचपन था,

वह मेरे लिए बंधन बन गया—

और वही आदत

आज तक मेरी पहचान है।

मेरा बचपन

थोड़ा देर से आया,

जब बाकी लोग बड़े हो रहे थे,

सपनों के पीछे भाग रहे थे।

और मैं—

उन्हीं सपनों के पीछे

अपनी ही धुन में

कुछ नया खोजता चला गया।

बार-बार गिरना,

बिखरना,

फिर खड़े होना—

इसी प्रक्रिया ने मुझे

कठोर, ज़िद्दी और मज़बूत बनाया।

पर भीतर

बचपन की मासूमियत

अब भी चलती रही।

जो मैंने झेला,

वह किसी और की शिकन न बने—

बस इसी कोशिश में

मैं खुद को घिसता रहा।

कभी वक़्त मेरे पास आया,

कभी मैं वक़्त के पास गया,

पर अपना निर्माण

मैंने खुद किया।

आज भी गिरता हूँ,

टूटता हूँ,

और फिर खड़ा हो जाता हूँ—

खुद को वैसे ही समेटता हुआ

जैसे नदी

भूमि के आकार से

अपना रास्ता तय कर लेती है।

कठिन सफ़र हो

या अबूझ रास्ता—

कदम चलते ही जाते हैं।

और यह अबूझ ही है मेरे लिए

कि मैं

अपने आप

आगे बढ़ता चला जाता हूँ।

Hindi Poem by Pawan Kumar Sharma : 112016612
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