मुस्कुराहट
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कुछ आकृतियाँ
इरादे से बनती हैं,
कुछ भूख से,
कुछ अभ्यास से।
और कुछ
बिना सिद्ध किए
अचानक घट जाती हैं।
तुम्हारी मुस्कान
उसी श्रेणी में आती है।
जब तुम मुस्कुराती हो
तो होठों के बीच
बहुत कुछ ठहरता है—
और उस ठहराव में
संरचना
बनती भी है
और बिगड़ती भी।
हुसैन होता तो इसे
निर्भीक कहकर रह जाता,
रविदास
प्रेम कहकर
उसे मनुष्यता में लौटा देता।
और पिकासो
अप्रत्याशित घटना कहकर
खुद को बचा लेता।
खैर,
इन सभी से इतर
मैं कहूँगा इसे
सबसे सुंदर संग्रहालय,
जहाँ चित्र
स्वेच्छा से उभरते,
जीते
और साँस लेते हैं।
शायद इसलिए
मैं घंटों पेंसिल चलाकर भी
नहीं बना पाया
वो चित्र
जो तुम सिर्फ़ हँसकर
बना गई।
@ कुणाल कुमार