समझदारी की दस्तक
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बचपन की वो शाम शायद उस दिन खत्म हो गयी,
जब हमारे शौक जिम्मेदारियों में तब्दील हो गए।
जिस दिन हमने गिरने से ज्यादा खुद को
संभालना सीख लिया।
बोलने से पहले सोचना सीख लिया।
जिद करने से पहले मान जाना सीख लिया।
पैर फैलाने से पहले चादर मापना सीख लिया।
रिश्तें निभाने से पहले उन्हें परखना सीख लिया।
और शायद तभी से हम बड़े कहलाने लगे।