सुनो लकीरों से उतर चुकी हो, अब ज़हन से भी उतर जाओ।
पहले से ही ताल्लुकात अच्छे नहीं है, निंद और आंखों के।
तुम भी आग में घी मत मिलाओ।
जाओ, जिसके हो उसे परेशान करना।
मेरे ख्वाबों में मत आओ।
सोने नहीं देता, ये तेरा सामने बैठ कर मुस्कुराना।
ढूंढने लगता हूं उठ कर इधर उधर। कम से कम इतने करीब मत आओ।
लकीरों से उतर चुकी हो, अब ज़हन से भी उतर जाओ।।