मैं और मेरे अह्सास
ठंडी हवा
भीतर से नशीली यादों की ठंडी हवा आती हैं l
तभी सर्द रातें तन मन को भड़का जाती हैं ll
मुलाकात बहुत छोटी ही सही पर हसीन सी l
मुस्कुराहट की लहरे दिल से टकराती हैं ll
तेज बयारो ने इस तरह घेरा डाला हुआ कि l
रात कंबल के गर्माहट से लिपटकर बीती हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह