॥ आल्हा: अर्जुन का मान-मर्दन ॥
सुमिरन करूँ मैं सरस्वती माँ का, सुर में दे दे ज्ञान महान, आशीष लेखक की वाणी से, गाऊँ योद्धाओं का गान। कुरुक्षेत्र की उस माटी में, मय मय मचा घमासान, आमने-सामने खड़े हुए थे, अर्जुन और कर्ण बलवान ॥
कर्ण ने खींचा धनुष कान तक, मारो बाण बिजली की ढाल, अर्जुन का रथ दस हाथ खिसका, डोल गया सारा पाताल। फिर अर्जुन ने गांडीव ताना, साधे बाण अग्नि की धार, पंद्रह हाथ कर्ण को ठेला, बोले पार्थ मरो हुंकार ॥
अट्टहास कर बोले अर्जुन, "देखो माधव! मेरा जोर, मेरा बाण है सबसे भारी, कर्ण का बल अब हुआ थोर। वो तो बस दस हाथ हटा पाया, मैंने पंद्रह दिया खिसकाय, मुझसा योद्धा इस दुनिया में, दूजा नजर न कोई आय" ॥
मुस्कुराए तब कृष्ण कन्हैया, बोले "पार्थ! सुनो धरि ध्यान, मूरख जैसी बातें छोड़ो, तज दो अपना ये अभिमान। तेरे रथ पर वीर हनुमान, जो लांघ गए थे सातौ सिन्धु, शेषनाग ने थामे पहिए, मैं हूँ खड़ा जगत् का बन्धु" ॥
"ब्रह्मांड का भार लिए बैठा हूँ, मैं त्रिलोकी का करतार, फिर भी कर्ण ने रथ को ठेला, धन्य-धन्य वो वीर अपार। अगर न होते हम इस रथ पर, उड़ता रथ बन कर के धूल, कर्ण के बाणों की मार से, उड़ जाते तेरे सब मूल" ॥
ग्लानि से भर गए धनंजय, झुका दिया चरणों में शीश, अहंकार जब-जब बढ़ा जग में, तब-तब सीख दिए 'आशीष'। हाथ जोड़ अर्जुन तब बोले, "कर्ण है योद्धा महा-महान", बिना हरी की कृपा के जग में, सब है कोरा ही अभिमान ॥
Adv. आशीष जैन
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