मैं चाहता हु
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मैं चाहता हूँ
कस्बे की बंद पड़ी घड़ी में
बैठे कबूतर कभी न उड़ें।
अगर उनके पंख फैल गए
तो मिनट का काँटा
सेकंड के काँटे से छोटा होगा।
मैं चाहता हूँ
पुरानी सड़कों पर
उतनी ही जीर्ण धूल में
मैं खेलूँ,
जैसा बचपन में
धूल से भर जाता था।
बुढ़ापा भी उसी प्राचीन धूल से
एकरूप हो जाए।
मैं चाहता हूँ
कबूतर अब उड़ें,
क्योंकि जो जैसा होना है,
वह वैसा होता ही है।
मिनट, सेकंड के काँटे
उड़ान से कभी बड़े नहीं होते।
कबूतर उड़ें
और धूल पंखों में भरकर
वहाँ ड्रोन से पहले पहुँचा दें,
जहाँ बंद पड़ी घड़ी नहीं है।
धूल, बचपन, बुढ़ापे को
हर दफ़ा नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है।
मैं चाहता हूँ
कबूतर वहाँ जाए…
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