*मुखौटों से ओढ़ा धर्म*
लोग कहते हैं उन्हें आता है सारा जैन धर्म,
पर आचरण में दिखता नहीं कहीं कोई सत्कर्म।
बातों में तो अहिंसा का बड़ा राग गाते हैं,
पर व्यवहार में न जाने क्यों कटुता ले आते हैं।
खुद को 'जैन' बताने का यह कैसा है अभिमान?
जब भीतर न बचा हो करुणा का कोई स्थान।
सिर्फ कुल में जन्म लेने से कोई जैन नहीं होता,
बिना सम्यक विचारों के, इंसान बस भ्रम में है सोता।
कथनी और करनी का यह अंतर बड़ा भारी है,
आत्मा को भुलाकर बस दिखावे की तैयारी है।
जब तक हृदय में प्रेम और क्षमा का वास नहीं,
तब तक सच्चे जैन होने का होता आभास नहीं।
आशीष सुनो अब, धर्म सिर्फ किताबों में नहीं होता,
वो तो आचरण की शुद्धता और विचारों में है सोता।
Adv. आशीष जैन
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