मै उजालो से डरता हु, अंधेरो मे फिरता हु ,
जहा से दुर एक कोने मै बसता हु,
पता है मुजै मैरै हालात, मै मुजमैही रहता हु,
राज की तरह मै भी खामोश,शा हु,
सब चील्लाते है, मगर मै जैसै दफ्न रहता हु,
गुजरते रहते दिन, रात, महीनो, बरसो,
और, मे तरसते, पडपता,अंधेरो मे छीपता हु,
डरा सहमा दुर से सब देखता रहता,
संसारकी भीडमे,मै खुदको खोजता रहता हु,
कुछ तो होगा, ए आस लेकर बैठा हु,
अंधेरेके बावजूद वो मुजे देखेगा इंतज़ार करता रहता हु,
बेबस हु, लाचार हु, जाने कबसे चुप हु,
छ गज माटी मे सीमटा, कोन हु मै? पुछता रहता हु,
बरसो से, तरसते कान इक आवाज सुनने,
जबसे मुजे यहा छोडा, मे अंधेरो मे रहता हु,
बहुत भिड लगीथी, उस रोज उजाले मै,
दफनाया सबने रोते हुए मुजे, कही अंधेरोके शहर मै.
मै उजालो से डरता हु, अंधेरो मे फिरता हु.