अध्याय ९: रक्त की नदी और प्रतिक्रमण (काव्य रूपांतरण)
अमावस का सन्नाटा और मेघवर्णा (करुण रस)
अमावस की काली चादर ने, रणभूमि को ढँक लिया,
धरती के पावन आँचल को, लाल लहू से रँग दिया।
पास पड़ी थी मेघवर्णा, जो साथी थी हर युद्धों की,
टूट रही थी साँस उसी की, ढाल बनी जो क्रोधों की।
अंतिम विदाई (शोक रस)
गोद में लेकर शीश प्रिया का, राय बहुत ही रोये थे,
अश्रु गिरे जब घावों पर, वो सुध-बुध अपनी खोये थे।
मेघवर्णा की मौन आँख, तारों की ओर जम गई,
योद्धा के जीवन की नैया, विदा देख कर थम गई।
शत्रु का पत्र और आत्मग्लानि
ठोकर लगी एक ढाल से और देखा इक बालक लेटा,
अठारह की उम्र रही होगी, किसी माँ का वह प्यारा बेटा।
पास पड़ा था पत्र अधजला— 'पुत्र! शीघ्र घर आ जाना,
बहन खड़ी है बाट जोहती, तू बस विजय मना लाना।'
अंतरात्मा का झंझावात
काँप उठा चामुंडराय, वह पत्र देख चिल्लाया था,
'क्या यही विजय है मेरी? जो मैंने आज ये पाया था?
कोख सूनी कर माताओं की, क्या सिंहासन सजेगा?
क्या मासूमों की हड्डियों पर, जीत का बाजा बजेगा?'
वज्रमुष्टि का त्याग (वीर-वैराग्य संगम)
अजवा बोले— 'विजय मुबारक!', राय दहाड़ के बोले थे,
'किसकी जीत मनाते हो तुम?', राज़ हृदय के खोले थे।
'जिस धर्म में करुणा ही न हो, वह अहंकार का खेल है,
भक्षक बनी ये वज्रमुष्टि, अब रक्त-मज्जा का मेल है।'
आत्मा का प्रतिक्रमण (भक्ति और शांत रस)
मिट्टी पर घुटने टेक दिए और हाथ जोड़ कर शीश नवा,
'खामेमि सव्व जीवे' कहकर, माँगी सबसे क्षमा-दवा।
'हे अरिहंत! क्षमा करना मुझे, मैंने जीव सताए हैं,
पद-प्रतिष्ठा के मद में, मैंने शोणित-सिंधु बहाए हैं।'
नया संकल्प और प्रस्थान
फेंक दी दूर वह तलवार, जो पुराने कल का अंत थी,
राख में दफन हुआ मार्तंड, अब जीवन की राह संत थी।
'अब पत्थर के सीने में, मैं शांति की मूरत लाऊँगा,
श्रावक बन कर सत्य-अहिंसा, जग को मैं सिखलाऊँगा।'
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मेरा उपन्यास
"दक्षिण का गौरव"
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