#8. दिल ऐसे तोड़ के गयी हैं जैसे कभी अपना था हीं नहीं,
अब मुझे लगता हैं कभी तुमसे हाल-ए-दिल बयां करना था हीं नहीं,
कुछ दिन पहले तु मुझपे मरती थी मेरे एक दीदार को तरसती थी,
कल तूने मुझसे नजरे ऐसे चुराई जैसे मैं कभी अपना था हीं नहीं,
क्या तुम वही हो जिसके ख्यालों में आता था जिसके सपनों को मैं सजाता था,
कैसे अकिं कर लूँ कि तुम बदली नहीं हो कल जो मैंने तुम्हें उसके साथ देखा वो कोई सपना था हीं नहीं ।
:- रौशन कुमार केसरी
15.12.2025