जिन्दा
जिस्म से जिन्दा, रूह से मरे हुए हैं,
साँसें चलती हैं, मगर ज़मीर ठहरे हुए हैं।
आईनों में रोज देखते हैं चेहरा अपना,
पर सच के सामने की नजरों में झुके हुए हैं।
कब्र में लेटे मुर्दा भी इंसान से डरे हुए हैं,
क्योंकि यहाँ जीते लोग ही कातिल ठहरे हुए हैं।
हाथों में ताज, होंठों पर झूठ की हँसी,
दिलों में बस खंजर, इरादे ज़हरीले भरे हुए हैं।
बोलते बहुत हैं, पर सच की जुबाँ गूँगी है,
हर आवाज बिकाऊ, हर ख़ामोशी सस्ती है।
इंसानियत को हमने बोझ समझकर उतार दिया,
अब हैरानी है कि फ़िजा इतनी बदहवास क्यों सी है।
जो जिन्दा हैं, वही ज़्यादा ख़ौफ फैलाते हैं,
मुर्दे तो चुप हैं, वो किसी का क्या बिगाड़ते हैं।
यह दौर गवाही माँगता है, चरित्र की नहीं,
यहाँ तो साए भी अब हथियार उठाते हैं।
अगर रूह को जिन्दा करने की चाह बची हो कहीं,
तो पहले इंसान बनना सीखना होगा यहीं।
वरना इतिहास लिखेगा तंज के हर पन्ने पर—
कब्रें महफूज थीं, ख़तरा जिन्दा लोगों से ही था यहीं।
आर्यमौलिक