अकेला पेड़ और रहस्यमयी गुफा
एक जंगल था—बहुत पुराना, सदियों से भी पुराना। वहां के पेड़ अपनी जगह छोड़ सकते थे। मतलब, अगर एक पेड़ बोर हो जाए, तो वह नदी में नहाने के लिए जा सकता था।
इसी जंगल में कहीं दूर एक गहरी गुफा थी। उस गुफा में कौन रहता था, इसका पता किसी को भी न था। बस हवा के सिवाय गहरी गुफा के भीतर कोई भी नहीं जा सकता था।
एक दिन, एक पेड़ जिसकी शाखाएं बड़ी तो थीं पर वहां न पत्ते थे, न ही कोई फल खिलते थे, उस गुफा के पास आया। वह पेड़ अपने आप में काफी अकेला था। उसका कोई दोस्त या रिश्तेदार नहीं था, और किसी के पास वह खुद से जाता भी नहीं था। उसका स्वभाव मेलजोल वाला नहीं था।
उसने एक कौवे को बात करते हुए सुना था कि, "यह गुफा न जाने कितनी सदियों से अकेली है, इसके अंदर कोई रहता है।"
पेड़ को लगा, और पहली बार लगा कि उसे गुफ़ा में जाना चाहिए। जो कुछ गुफा में उसकी तरह अकेला रहता है, उसे उसके साथ रहना चाहिए।
वह डरते-सहमते गुफा के रास्ते से भीतर जाने के लिए मुड़ा ही था कि एक भारी आवाज आई, "रुको!"
उसकी जड़ें जमीन में धंस गईं। वह अपनी जगह पर ही ठिठक गया। उसने देखा कि ये आवाज एक हाथी की थी, पर ये आम जंगली हाथी न था। इस हाथी के तीन सिर थे। उसमें से एक सिर ने पेड़ को रोक दिया था।
"क…क…क्या हुआ? आप मुझे क्यों रोक रहे हो?" पेड़ ने पूछा। उसकी छोटी टहनियां उंगलियों सी हिल रही थीं।
"इस गुफ़ा में जाने पर पाबंदी है – क्या तुमने आदेश नहीं सुना… बहुत पुराना आदेश है ये। जंगल से भी पुराना," हाथी की सूंड ऊपर करते हुए उसका दायां मुंह बोला।
"कैसा आदेश?" पेड़ ने शाखाएं उचकाईं।
"कि कोई इस जंगल में अकेला नहीं रहेगा – और जो अकेला रहता है…" बोलते हुए हाथी आसमान की तरफ देखते हुए अचानक शांत हो गया।
"जो अकेला रहता है? आगे मतलब मैं समझा नहीं आप कहना क्या चाह रहे हो…" एक-एक शब्द तोल-मोल कर पेड़ सावधानी से बोल रहा था, क्योंकि वह खुद ही आदेश का पालन नहीं कर रहा था एक तरह से। इसलिए उसकी लकड़ी में डर भर रहा था।
"वो आसमान देखो… कभी वह नीला नहीं था। न उसके पास इंद्रधनुष था, न बिजलियां, न पानी के बूंदों के बच्चे," बोलते हुए हाथी अभी भी ऊपर नजरें टिकाए था।
"तो इससे मुझे क्या… और इस आदेश का इस चीज से क्या लेना देना?" पेड़ ने विस्मित होते हुए कहा।
"तब आसमान अकेला था। क्योंकि वह इस गुफ़ा के पास भटकता रहता था। उसने तब आदेश माना था और देखो आज वह अकेला नहीं है," हाथी ने जानकारी दी।
पेड़ ने अपनी शाखाएं समेटीं और वह वहां से जाने के लिए अपनी मद्धम जड़ों के डग भरता हुआ निकल पड़ा। लेकिन पेड़ ने भीतर से तय कर लिया था कि वह यहां फिर आयेगा।
फिर आयेगा, इस हाथी के जाने के बाद…