आज के समय में सबसे बड़ा सवाल यह है—
क्या हमारा वजूद सच में है, या केवल शोर है?
(समकालीन नज़्म)
शीर्षक - वज़ूद
वजूद था,
पर वजूद का
कोई गवाह न था—
क़त्ल हुआ
पर सबूत न था।
कहने को बहुत कुछ था,
मगर
सच सुनने वाला
कोई मौजूद न था।
इंसान होना
सिर्फ़ साँस लेना नहीं,
इक-दूजे से
मुहब्बत करना ज़रूरी है।
मसीहा बनने की चाह में
कब शैतान बन गए—
इसका
हिसाब न था।
ऊँचाइयों तक
उछाल दिए गए,
ज़मीन कहाँ है
पता न था।
डंका बहुत बजा,
पर कब
मदारी बन गए—
ख़ुद को भी
ख़बर न थी।
ज़िंदगी
मोहब्बत और जिंदादिली के सिवा
कुछ भी नहीं,
अमर कोई नहीं—
मरते रहे
जीने की चाह में।
गणेश कछवाहा, रायगढ़ , छत्तीसगढ़।