पशुत्वमानुष
किसी ने जन्म लिया सिंह-योनि से,
तो कोई कुत्ते की प्रकृति लेकर आया,
कहीं हिरण-सा डर और कोमल मन,
कहीं गौ-सा धैर्य, कहीं भैंस-सा सादा साया।
आकृति सबकी मनुष्य कही जाती है,
पर मन का दर्पण अलग-अलग है,
कोई भीतर से जंगल ढोता फिरता,
तो कोई अपने भीतर ही वृत्त बदल रहा है।
मनुष्य होना केवल देह का गहना नहीं,
ये भीतर की ज्योति और संस्कारों का खेल है,
जो मन में करुणा उगा न सके,
वह इंसान होकर भी अधूरा और अकेला मेल है।
कुछ लोग अभी भी पशु-वृत्ति से ऊपर
चढ़ना सीख रहे हैं, समझना सीख रहे हैं,
मनुष्यत्व कोई जन्म का उपहार नहीं—
ये तो साधना है, जिसे कुछ ही लोग
सचमुच जीना सीख रहे हैं।
देह सभी की एक-सी लग सकती है,
पर आत्मा का स्तर अलग चमक दिखाता है—
जो पशुता से मानवता तक का सफर पकड़ ले,
वही असली “मनुष्य” कहलाता है।
आर्यमौलिक