कलम की आवाज़
लाखों लोग मोबाइल में उलझे हुए हैं,
उँगलियों में दुनिया, दिल सूने पड़े हैं।
कोई रोटी के टुकड़े को तरसता हुआ,
कोई फ़ैशन में डूबा, सच्चाई से अनजान हुआ।
हज़ारों हैं जो दौड़ रहे हैं नाम के पीछे,
थक गए हैं सपने, पर रुकते नहीं सीने।
कुछ गिनते हैं नोट, कुछ गिनते हैं लाइक,
किसी को नहीं फ़ुर्सत, किसी को नहीं वक़्त।
पर कुछ ऐसे भी हैं, जो ख़ामोश लिखते हैं,
अंधेरे समाज में उजाला बिखेरते हैं।
उन्होंने मोबाइल नहीं, कलम को थामा है,
हर शब्द में सच्चाई का दीप जलाया है।
जहाँ भी अन्याय, वहीं उनकी स्याही बहती,
जहाँ भी मजबूरी, वहीं कविता कहती।
उनके अल्फ़ाज़ कोई खेल नहीं होते,
वो ज़िंदा समाज की नींव होते।
कलम चलती है, तो क्रांति जन्म लेती है,
सोई हुई आत्मा भी जाग उठती है।
मोबाइल से आगे भी एक दुनिया है,
जहाँ विचारों की सबसे बड़ी पूँजी है।
सलाम उन हाथों को जो लिखते हैं सच,
जो झूठ की भीड़ में जलाते हैं मशाल हर पल।
क्योंकि समाज वही बदलेगा एक दिन,
जिसके पास कलम की ताक़त होगी,
न कि मोबाईल फोन की चाहत होंगी।
क्या बदलेंगे लोग, बदलेगा युग...?
आर्यमौलिक