अब उन्होंने प्यार का इजहार तो कर दिया था,
लेकिन अभी बहुत कुछ कहना और सुनना बाकी था,
पुरानी गिले शिकवे जाहिर की गई,
पर प्यार के आगे सब भुला दी गई,
फिर बातों का रुख कुछ इस तरह बदला और उन्होंने एक सवाल पूछा- "सुनो, गुस्सा तो नहीं करोगी अगर मैं कुछ मांगू?"
मैंने भी बोला - "दुनिया में ऐसा कोई लफ्ज़ नहीं जो आपके मु से सुन मैं नाराज़ हो जाऊ, कोई आपकी ऐसी इच्छा नहीं जिसे मैं पूरा ना कर सकू!"
बड़े ही शर्माते और कांपते शरीर के साथ वो बोले -
"क्या मुझे एक मौका दोगी?
क्या मुझ पर भरोसा करोगी?
क्या मेरे प्यार के लिए अपने होठों को तुम्हारे होठों से छूने की इजाजत दोगी?
क्या मेरी इस गुस्ताखी के लिए मुझे माफ करोगी?"
ये सुन मैं स्तब्ध रह गई,
क्या बोलूं ये समझ ना पाई,
मेरे चारों तरफ लोग थे,
लेकिन मेरे सामने तो मेरे महबूब थे,
न किसी ओर देखा ना किसी इंसान की परवाह की,
बस झट से उनके गले लग गई,
वो मुझे सहलाते रहे,
और मैं चुप थी।
बाकी कुछ हुआ या नहीं ये तो बाद की बात है ,
लेकिन ये वो पल था,
जब इजहार के बाद हमने पहली बार गाले लगा था ।