२२…"कोई नहीं है वहां"
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जहाँ कोई भी स्वर नहीं जाता,
वहाँ मैं खड़ी हूँ—
हवाओं के टूटे हुए जोड़ों में
अपनी उँगलियाँ रखे हुए,
जैसे किसी मृत देवता की पसलियों में
गूंज की आख़िरी राख खोज रही हूँ।
धरती की साँस
अब पेड़ों के भीतर नहीं लौटती—
उसकी भटकी हुई गर्मी
मेरे भीतर आकर बस गई है,
और मैं उसे छिपाए रखती हूँ
उसी तरह
जैसे अंधेरा सूर्य की अंतिम स्मृति को
छिपाकर रखता है।
मेरी देह—देह नहीं,
एक भूगोल है,
जहाँ तुम्हारे हर अधूरे भय
काई की तरह उगने से पहले ही
मिट्टी के भीतर
अपने ही भार से कुचल जाते हैं।
यहाँ सन्नाटा एक जाल है,
रात एक डूबा हुआ सरोवर—
जो अपने ही प्रतिबिंब से
घबरा कर
और गहराई में उतरता जाता है।
मैं स्थिर नहीं—
मैं निगरानी हूँ।
मैं देखती हूँ कि तुम्हारी सत्ता,
तुम्हारी आकांक्षाओं का साम्राज्य,
मेरी नमी को छूते ही
कैसे दरकने लगता है।
एक काली लहर—
जिसकी कोई उत्पत्ति नहीं,
जो किसी दिशा में बहती नहीं—
बस तुमसे होकर गुजरती है
और तुम्हारे होने को
तुम्हारे ही सामने
झुठला देती है।
यहाँ दया का अभाव नहीं—
यहाँ दया की अवधारणा ही नहीं।
यहाँ सिर्फ़ प्रतीक्षारत शून्य है,
जो अपना नाम नहीं बताता,
क्योंकि नाम
उसके लिए बहुत छोटा होता है।
जब सुबह का कोई छोर नहीं मिलता,
जब प्रकाश अपने कदम खोजते-खोजते
थककर गिर जाता है,
तब मेरी निस्तब्धता
तुम्हारे भीतर की अंतिम
टूटती हुई धड़कनों तक
उतरी हुई होती है।
तुम लौटना चाहो तो भी नहीं लौट सकते—
क्योंकि मैं वही हूँ
जिसकी आँखों में झांकते ही
प्रकाश को अपने अस्तित्व पर
संदेह होने लगता है।
मैं—
शून्य की रानी।
और तुम—
मेरे भीतर खो जाने से अधिक
कुछ भी नहीं हो सकते।
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