( जब मैं मर जाऊंगी )
वो चाहती थी कि जब उसकी चिता को आग लगे तो उसकी किताबों को भी जला दिया जाए—
जो उसने लिखे थे वो उसके साथ ही जल के राख हो जाए—
उसके सपने और ख्वाब उसमें समा जाए—
और जिन्हें वो पढ़ा करती थी उन्हें उसकी यादों में सजा के रखा जाए—
उस कमरे को फूलों के बदले शीशे के टुकड़े से सजाया जाए जैसे वो अपने लिखे लफ्जों को सजाया करती थी–
उसके उस बिस्तर के चादर को आंसुओं से सजाया जाए जैसे वो अपनी उन आंखों को सजाया करती थी—
उसके उन कपड़ों को लाल रंग में रंग दिया जाए जैसे वो अपने उन हाथों को रंग दिया करती थी—
अगर करना होगा दफन तो किताबों के संग उसके उस खास शीशे को भी दफन कर देना और उसके उस मनपसंदीदा फुल को मत भूलना जो वो दूर से देखा करती थी—
मेरे शब्दों को समझने की कोशिश मत करना....
"उन पन्नों पर जो लिखा है उसने बहुत दर्द दिया है लेकिन दर्द पन्नों को नहीं लिखने वाले को हुआ है।"
पन्नों का क्या है जनाब, वो तो कभी किसी रंग में रंगते है तो कभी किसी रंग में, वो तो दर्द सुनने का काम करते है–
"फिर एक दिन ये दर्द सुनने वाला और सहने वाला दोनों दफन हो जाते है !"