— आत्मा से परमात्मा तक की एक यात्रा —
(कविता — सुरूचि फतेहपुरिया)
यह चोला मिला है प्रभु के वचनों पर चलने के लिए॥
समुद्र-सी गहरी और विशाल,
पहाड़ों-सी अडिग और सुन्दर यह आत्मा है।
फिर क्यों करे इसे सिमित⋯
लगा देने दे प्रभु की वाणी के पर⋯
और उड़ जा — मुक्त होकर इस रिवाजी दायरे से।
हर पल यह क्षितिज पुकार रहा है —
तुझे विशालता में समाने के लिए॥
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कहते हैं नदी की तरह — बस बहता जा,
मलय-पवन-सी सुगंध बन हर जगह मिल जा।
अपने लक्ष्य को पाने के लिए,
नहीं तो भटकेगा तू दर–दर।
ए प्रभु! तेरी कृपा यूँ ही बरक़रार रहे,
बस यही है ख़्वाहिश।
हर पल, हर क्षण में तू ही समाया है॥
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ऐ मन, रूक जा — ठहर जा,
इस चितवन में वाणी के फूल ज़रा खिल जाने दे,
ताकी न रहे कोई संशय – भ्रम,
बस समानता में गुम ही जाऊँ।
हर पल, हर क्षण में बस प्रभु के सुनहरे शब्द बस जाएँ॥
ऐ बुद्धि, तू अच्छे–बुरे के मिटर से निकल जा,
क्योंकि इसका न कोई मोल है।
प्रभु ने सिखाया है कि इससे ख़राब होते हैं
तन, मन और जीवन।
हर पल, हर क्षण मिला हुआ है परमात्मा से॥
ऐ तन, तू भूल जा अपना–पराया,
क्योंकि तू यहीं रह जाएगा।
अपने ही तुझे जला रहे हैं,
और आखिर में अपने ही जलाएँगे।
बस इस तन को तू लगा दे प्रभु के वचनों की सेवा में,
गुम हो जाने दे इस तन को आत्मा में,
क्योंकि यही है तेरा स्वरूप॥
यही तेरा विलय, यही तेरा उदय॥