१५…“गुफा बनकर”
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हर तरफ
जंगली घास-सी उग आती है नग्नता।
आँखों को चुभती है
इनकी खुली अवस्था —
वही शरीर,
जो किसी बाजार की तरह
हर क्षण पोस्ट होते रहते हैं।
कहीं न कहीं
शायद कोई सिद्धार्थ मिल ही जाए,
देखते हुए यह खोखला व्यापार।
नजर मर जाएगी
एक दिन —
जो हजारों की गिनती में
लाइक, कमेंट, और फिर लाइक
करते हुए देखते है
वही उजड़े, निर्वस्त्र देह।
आप, मैं, वे —
सभी हिस्सा हैं
इस कपड़े-विहीन दौर का।
हम लौट रहे हैं
फिर से प्राचीन गुफाओं में —
इस बार,
गुफा बनकर।
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