"एक शिकायत खुदा से"...
ऐ ख़ुदा, तूने मुझे इंसान क्यों बनाया,
और अगर इंसान बनाना ही था, तो लड़की ही क्यों बनाया?
मैं तो तेरी ही मिट्टी से बनी थी,
फिर मेरे हिस्से में ये बोझ-सी दुनिया क्यों रखी थी?
हर साँस पर किसी और का हक़ क्यों लिखा,
मेरे होने पर भी सवाल-सा वक़्त क्यों टिका?
तू मुझे तितली बना देता तो बेहतर था,
रंगों में घुल जाती, फूलों पे मुस्कुरा आती।
या हवा बना देता, जो बेख़ौफ़ बहती,
ना किसी के इशारे पे ठहरती, ना किसी डर से रुकती।
या चाँद के बगल में चमकता कोई सितारा बना देता,
जो दूर से ही सब देखता, मगर किसी का नहीं होता,
बस अपनी हल्की-सी रौशनी से अँधेरों को सुकून दे जाता।
या दरिया का एक कतरा बना देता,
जो बहता तो किसी का नहीं, पर सबको सींचता चला जाता,
जिसे रुकना न आता, ना ठहरना गवारा होता।
पर तूने मुझे लड़की बनाया,
जिसे हर कदम सोचकर रखना पड़ता है।
जिसकी हँसी पे भी हदें तय कर दी जाती हैं,
और ख़ामोशी को भी गुनाह समझा जाता है।
मगर अब शिकवा नहीं, बस एक इल्तिज़ा है तुझसे —
मेरे हिस्से की ज़ंजीरों को थोड़ा हल्का कर दे,
कि मेरे हक़ में भी थोड़ी रौशनी भर दे,
ताकि मैं इन दीवारों के बीच भी अपनी पहचान बुन सकूँ,
और तेरे बनाए जहाँ में — अपनी रूह की आवाज़ बन सकूँ।
Kirti Kashyap"एक शायरा"✍️