🌺 "प्रेम — जो देखा नहीं जा सकता"
प्रेम कोई अनुभूति नहीं, यह तो अस्तित्व की भाषा है,
जहाँ शब्द मौन हो जाते हैं, वहीं से इसका आरंभ होता है।
यह शरीर की धड़कनों में नहीं, आत्मा की लय में बसता है,
जहाँ चाहत नहीं, केवल समर्पण होता है।
जो प्रेम में डूबता है, वह खोता नहीं — स्वयं को पा लेता है,
क्योंकि सच्चा प्रेम स्वामित्व नहीं, मुक्ति देता है।
वह कहता नहीं "तू मेरा है",
वह कहता है — “मैं तेरा हूँ, बिना शर्त, बिना सीमा।”
प्रेम कोई घटना नहीं, यह एक जागरण है,
जहाँ भीतर का अंधकार स्वयं दीपक बनकर जल उठता है।
जब तुम किसी से प्रेम करते हो बिना अपेक्षा,
तब ईश्वर तुम्हारे माध्यम से मुस्कराता है।
कभी यह मौन ध्यान की तरह उतरता है,
कभी अश्रु बनकर नयनों से बहता है।
कभी यह दूरी में भी निकटता देता है,
कभी पास रहकर भी विरक्ति सिखाता है।
जो प्रेम केवल पाने की कामना करे, वह व्यापार है,
जो देने में सुख पाए, वही सच्चा उपहार है।
क्योंकि प्रेम का सार 'मिलन' नहीं,
‘मिटना’ है — अहंकार का, अभिमान का, “मैं” का।
प्रेम में जब “मैं” और “तू” का भेद मिट जाता है,
तभी आत्मा ईश्वर के स्पर्श को पहचानती है।
वहीं से शुरू होती है वह अनंत यात्रा,
जहाँ हृदय साधना बन जाता है और जीवन प्रार्थना।
प्रेम कोई संबंध नहीं, एक स्थिति है —
जहाँ समय, दूरी, वचन सब अप्रासंगिक हो जाते हैं।
यह किसी के पास ले नहीं जाता, भीतर के शून्य तक पहुँचाता है,
जहाँ सारा ब्रह्मांड तुम्हारे मौन में समा जाता है।
कभी यह माँ की ममता बनकर झरता है,
कभी किसी संत की निस्तब्ध दृष्टि में ठहरता है।
कभी यह विरह में तप बनता है,
कभी मिलन में समाधि का रस बन जाता है।
जो प्रेम को समझ गया, वह जीवन के रहस्य को पा गया,
क्योंकि प्रेम ही वह दरवाज़ा है