Hindi Quote in Poem by Hriday Priya

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थोड़ा वक़्त और सही, पापा…

जब पापा के पास पैसे थे,
तो घर में भीड़ रहती थी।
हर त्यौहार पर रिश्तों की गिनती
थोड़ी और बढ़ जाती थी।

हर कोई कहता था — “भाई, आप तो हमारे अपने हैं,”
हर आवाज़ में अपनापन था,
हर मुस्कान में मतलब छिपा था,
पर हमें वो तब समझ नहीं आया था।

पापा ने तो सबके लिए किया —
ज़रूरत से भी ज़्यादा।
कभी किसी की फ़ीस भर दी,
कभी किसी का घर बनवाया।
जिन्होंने “धन्यवाद” तक नहीं कहा,
आज वही सबसे ज़्यादा दूर नज़र आते हैं।

वक़्त बदला…
पापा की आँखों में अब अनुभव की रेखाएँ हैं,
और शब्दों में एक गहरा सन्नाटा।
पर मुस्कान अब भी वही है —
थोड़ी थकी हुई, मगर सच्ची।

अब कोई फोन नहीं करता,
ना त्योहारों पर कोई हाल पूछता है।
जिनके लिए पापा ने रातें काटीं,
वो आज नज़रें भी नहीं मिलाते हैं।

माँ अब भी कहती हैं —
“शायद सब व्यस्त होंगे बेटा…”
पर मैं जानती हूँ,
वो सब अब हमसे सस्ते हो गए हैं।

पापा अब भी मुस्कुराते हैं,
हर बात में कह देते हैं — “कोई बात नहीं।”
पर उनकी आँखों की नमी
कई सालों का हिसाब लिख जाती है।

और सच ये है —
पापा कभी ये सोचते भी नहीं कि उन्होंने किसी के लिए क्या किया।
उनके लिए देना बस उनका स्वभाव है,
बिना किसी अपेक्षा या बदले की आशा के।
अगर किसी को उनकी जरूरत पड़े,
तो वो सबसे पहले खड़े होंगे,
बिना खुद की चाह देखे।

आज हमारा बुरा वक़्त है,
तो कोई हाल तक नहीं पूछता।
पर मुझे यक़ीन है —
कल जब सब ठीक हो जाएगा,
तो यही लोग फिर हमारे पास दौड़ते आएँगे,
उसी पुराने अपनापन का मुखौटा पहनकर।

पर तब शायद हम भी मुस्कुरा देंगे —
मगर इस बार मौन रहेंगे।

क्योंकि हमने सीख लिया है,
कि पैसा रिश्तों की सच्चाई नहीं बताता,
बस चेहरे का रंग दिखा देता है।

और मेरे लिए —
मेरे पापा अब भी सबसे अमीर हैं,
क्योंकि उनके दिल में आज भी
किसी के लिए कोई नफ़रत नहीं,
और किसी की ज़रूरत पर वो सबसे पहले खड़े होते हैं।

— हृदयप्रिया

Hindi Poem by Hriday Priya : 112003920
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