८……"घास"
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ये घास —
हरी घास, ऊनभरी घास,
सूरज की बूंदें पीती घास।
नदी के पास उगती, लहराती घास,
सुबह की ओस से बातें करती घास,
नीले आसमान को निहारती घास।
वृक्ष ने छोड़ी पीली हवाओं में खतों जैसी यादें,
और घास, पहाड़ की ओर तना-तना हिलती।
घास… घास… घास…
लेकिन ये काली हलचल क्या है?
ठंडी, डरावनी, काली हलचल।
और फिर —
काला कोबरा, फुस्स!!
घास ने उसे दिशा दिखाई।
हर लहर में, हर सांस में,
जीवित हो उठी यह घास।
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