Hindi Quote in Blog by Ranjeev Kumar Jha

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गांधी, सावरकर और इतिहास की चयनात्मक स्मृति!
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भारत का आधुनिक इतिहास एक उलझा हुआ ताना-बाना है। इसमें गांधी, सावरकर, भगत सिंह, नेताजी, पटेल—हर नाम एक अलग रंग बुनता है। किंतु दुखद यह है कि हमने इन महापुरुषों को संपूर्ण रूप में समझने की बजाय अपने-अपने चश्मे से देखा, और यही आज की कटुता का बीज है।

गांधीजी के प्रति असंतोष : समकालीन दृष्टि!
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अक्सर यह माना जाता है कि गांधीजी का व्यक्तित्व सर्वमान्य था। परंतु यह आधा सत्य है। विभाजन के बाद पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये देने के उनके आग्रह ने तत्कालीन जनमानस में भारी असंतोष भरा।

संदर्भ : सरदार पटेल और नेहरू दोनों ही इस भुगतान को टालना चाहते थे क्योंकि पाकिस्तान कश्मीर पर आक्रमण कर चुका था। किंतु गांधीजी ने इसे ‘न्याय’ का प्रश्न मानकर दबाव बनाया। (देखें: Durga Das, India From Curzon to Nehru and After, Macmillan, 1969)
उस दौर में न तो टीवी था, न ही सोशल मीडिया, फिर भी यह असहमति गाँव-गाँव में चर्चित थी।

गांधी की हत्या और उसके बाद!
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नाथूराम गोडसे द्वारा 30 जनवरी 1948 को की गई हत्या भारतीय इतिहास का सबसे त्रासद प्रसंग है। गोडसे को अदालत ने मृत्युदंड दिया और नवंबर 1949 में उसे फाँसी दे दी गई।

संदर्भ : Gopal Godse, Why I Assassinated Mahatma Gandhi, Surya Bharti Prakashan, 1993.
यहाँ तक तो प्रसंग समाप्त होना चाहिए था, किंतु राजनीति ने इसे जीवित रखा। गांधीजी की आलोचना को ‘गोडसे समर्थक’ ठहराना और हर राष्ट्रवादी धारा को ‘गोडसे की संतान’ कहना एक नया विमर्श बना। यही कारण है कि प्रतिक्रिया स्वरूप अनेक लोग गांधीजी पर आज भी कठोर शब्दों का प्रयोग करते हैं।

सावरकर : ‘माफीवीर’ या ‘वीर’?
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विनायक दामोदर सावरकर का नाम सुनते ही भारतीय राजनीति दो भागों में बँट जाती है।

1909 में ‘अभिनव भारत’ संगठन के माध्यम से क्रांतिकारी गतिविधियों में उनकी भूमिका रही।

1910 में उन्हें आजीवन कारावास मिला और अंडमान के सेल्यूलर जेल में उन्होंने 27 वर्षों का दंड भोगा (1911–1937)।

जेल में उन्होंने ‘हिंदुत्व : हू इज ए हिंदू?’ नामक ग्रंथ लिखा, जिसने भारतीय राष्ट्रवाद की एक नई परिभाषा दी।

संदर्भ : Vikram Sampath, Savarkar: Echoes from a Forgotten Past (1883-1924), Penguin, 2019.

गांधीजी के समर्थक उन्हें ‘माफीवीर’ कहकर उपहास करते हैं, क्योंकि उन्होंने अंग्रेज़ों से दया याचिका की। किंतु ऐतिहासिक साक्ष्य यह बताते हैं कि जेल से बाहर आकर भी सावरकर ने राजनीतिक सक्रियता और हिंदू समाज के संगठन में असाधारण योगदान दिया।

महाराष्ट्र में सावरकर की लोकप्रियता!
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आज भी महाराष्ट्र में सावरकर को आम जनता ‘वीर’ कहकर स्मरण करती है।

सावरकर स्मारक (दादर, मुंबई) और रत्नागिरि का उनका आवास लगातार श्रद्धास्थल बने हुए हैं।

हर साल हजारों लोग वहाँ श्रद्धांजलि देने आते हैं।

चयनात्मक स्मृति : समस्या की जड़!
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हमने अपने इतिहास को आधे-अधूरे रूप में ग्रहण किया। उदाहरणस्वरूप—

भगत सिंह को केवल ‘नास्तिक’ बताकर उनकी बलिदानी भावना को छोटा करना।

चंद्रशेखर आज़ाद के ‘हिंदू प्रतीकों’ का उपहास करना।

सावरकर को खलनायक और गांधीजी को निष्कलंक संत की तरह पेश करना।
इतिहास यह सिखाता है कि स्वतंत्रता संग्राम किसी एक व्यक्ति, एक विचारधारा या एक संगठन की देन नहीं था।

कांग्रेस में लाल-बाल-पाल, पटेल, नेहरू और शास्त्री जैसे लोग थे।

वहीं दूसरी ओर नेताजी सुभाषचंद्र बोस की आज़ाद हिंद फौज, सावरकर और सशस्त्र क्रांतिकारी भी सक्रिय थे।

संदर्भ :

1. Bipan Chandra, India’s Struggle for Independence (Penguin, 1989).

2. R.C. Majumdar, History of the Freedom Movement in India (Firma KLM, 1963).

आज की कांग्रेस जब स्वतंत्रता संग्राम का श्रेय अपने खाते में लिखती है तो यह वैसा ही प्रतीत होता है मानो कोई रिक्शाचालक यह दावा करे कि उसके पूर्वज दिल्ली के तख्त पर आसीन थे।
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन एक सामूहिक महागाथा थी। गांधीजी उसमें एक केंद्रीय पात्र अवश्य थे, किंतु वे अकेले नायक नहीं थे। यदि हम इतिहास को बिना चयनात्मकता के देखें, तभी हम सच्चे अर्थों में अपने अतीत का सम्मान कर पाएँगे।
आर के भोपाल

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