भारत में क्रांति का भय और गांधी की विरासत!
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श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल में हाल के वर्षों में जनता का गुस्सा हिंसक विस्फोट बनकर सामने आया। तानाशाही प्रवृत्तियों वाली सरकारें, विपक्ष का दमन, बेरोजगारी और महंगाई ने सड़कों पर क्रांति की चिंगारी जलाई। सत्ता-समर्थक वर्ग आज भारत में भी ऐसे ही दृश्य की आशंका से कांपता है। उन्हें लगता है कि मोदी सरकार का भी यही हश्र होगा। लेकिन यह डर निराधार है।
भारत का चरित्र ही अलग है। यहाँ कोई फ्रेंच या रशियन क्रांति नहीं हुई। तीन हजार साल की परंपरा में हम कभी एकजुट होकर तानाशाह का सिर उतारने नहीं निकले। हमारी चेतना निजी हित, जाति और धर्म तक बंधी रही। गांधी ने एक बार अंग्रेज़ों के खिलाफ सबको जोड़ा, लेकिन अंग्रेज़ जाते ही वह सूत्र टूट गया।
दूसरा कारण गांधीवादी धारा है। चौरीचौरा कांड से लेकर नौसेना विद्रोह तक, गांधी ने हर बार हिंसा को अस्वीकार किया। आज़ाद हिंद फौज के रणबांकुरों को भी सत्ता ने कभी पुनर्वास नहीं दिया। संदेश साफ़ था—हिंसक सत्ता-परिवर्तन देशभक्ति नहीं है। यही परंपरा आज तक कायम है।
भारत का आकार भी ऐसी क्रांति को असंभव बना देता है। लाखों लोग दिल्ली में इकट्ठा हों, पूरे देश में धरना-प्रदर्शन हो, तब भी सरकारें केवल चुनाव से बदलती हैं। जेपी आंदोलन, अन्ना आंदोलन और किसान आंदोलन इसका प्रमाण हैं।
राहुल गांधी हों या कांग्रेस, वे इस विरासत से बाहर नहीं जा सकते। उनकी राजनीति मतपेटी तक सीमित है, गोली और बारूद तक नहीं। यही कारण है कि भारत में न रक्तरंजित क्रांति होगी, न होनी चाहिए।
भारत का सिंहासन मत से हिलेगा, तलवार से नहीं। यही हमारी पहचान है।
आर के भोपाल।