लोकतंत्र की महीन चक्की
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भारत एक शब्द नहीं, एक महाकाव्य है। इसकी भूमि पर, इतिहास ने न जाने कितने अध्याय गढ़े हैं। कभी संघर्ष की ज्वाला धधकी, तो कभी शांति की शीतल हवा बही। किंतु इस महाकाव्य का सबसे अद्भुत अध्याय वह है, जो 'लोकतंत्र' की कलम से लिखा गया है। यह अध्याय केवल शब्दों का पुलिंदा नहीं, बल्कि एक जीवंत गाथा है, जिसमें सदियों से जमी हुई सामाजिक विषमताओं की परतें धीरे-धीरे, शांतिपूर्वक उतर रही हैं।
जब हम भारत के राजनीतिक परिदृश्य पर दृष्टि डालते हैं, तो यह केवल कुछ नामों या पदों का समुच्चय नहीं लगता, बल्कि एक बहुरंगी चित्रमाला प्रतीत होता है। कौन सोच सकता था कि एक राष्ट्र, जहाँ सदियों से जाति और वर्ग की दीवारें इतनी ऊँची थीं, वहाँ आज सर्वोच्च पद पर एक आदिवासी महिला विराजमान होगी? यह कोई संयोग नहीं, बल्कि लोकतंत्र की उस महीन चक्की का परिणाम है, जो चुपचाप, अथक परिश्रम से अपने कार्य में लगी रहती है।
जैसे कुम्हार मिट्टी को साधकर एक सुंदर घड़ा गढ़ता है, वैसे ही लोकतंत्र ने भारत को गढ़ा है। जहाँ एक ओर प्रधानमंत्री का पद ओबीसी वर्ग से आता है, सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का पद दलित समुदाय से सुशोभित होता है और गृहमंत्री का पद जैन-बनिया समुदाय से। यह दर्शाता है कि सत्ता का केंद्र अब किसी एक वर्ग या जाति तक सीमित नहीं है। यह उन सभी वर्गों तक पहुँच रहा है, जिन्हें कभी मुख्यधारा से दूर रखा गया था।
भारत की यह तस्वीर, एक बूँद भी रक्त बहाए बिना खींची गई है। यह कोई क्रांति नहीं थी, न ही कोई हिंसक विद्रोह। यह तो सभ्यता की एक धीमी, किंतु दृढ़ गति थी। यहाँ के 27 केंद्रीय मंत्री ओबीसी वर्ग से हैं, वित्त और विदेश मंत्रालय ब्राह्मणों के हाथों में है, तो रक्षा मंत्रालय क्षत्रिय के पास। सिख समुदाय के पास पेट्रोलियम मंत्रालय है, तो बौद्ध और आदिवासी मिलकर संसदीय कार्य संभाल रहे हैं। कानून का जिम्मा दलित के कंधों पर है। यहाँ तक कि मुसलमान समुदाय से मुख्यमंत्री और सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश तक हुए हैं,और हो रहे हैं।यह सामाजिक समरसता की ऐसी मिसाल है, जो दुनिया के लिए प्रेरणा बन सकती है।
यदि हम अपने पड़ोसियों पर नज़र डालें, तो स्थिति बिल्कुल विपरीत है। पाकिस्तान और बांग्लादेश में 'शेख-सय्यद' वर्ग का प्रभुत्व आज भी कायम है। वहाँ जातिवाद का शिकंजा इतना मजबूत है कि आम जनमानस के लिए शीर्ष पदों तक पहुँचना एक सपना ही बना हुआ है। इसके विपरीत, भारत ने लोकतंत्र के माध्यम से इस समस्या का समाधान शांतिपूर्वक किया है।
लोकतंत्र की चक्की धीरे पीसती है, यह सच है। लेकिन वह इतनी महीन पीसती है कि कोई भी कण, कोई भी वर्ग, कोई भी समुदाय अलग-थलग नहीं रह जाता। यह चक्की केवल पदों को नहीं पीसती, बल्कि सदियों की जड़ता को पीसती है। इसने नेहरू के समय की उस समस्या को भी धीरे-धीरे समाप्त कर दिया, जहाँ सामाजिक प्रतिनिधित्व में असमानता थी। यह प्रक्रिया अभी भी जारी है, 'कार्य प्रगति पर है'।
अंत में, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि भारत का लोकतंत्र केवल एक शासन प्रणाली नहीं, बल्कि एक महाभारत है, जिसमें हर वर्ग का अपना स्थान है। इसने शांतिपूर्ण तरीके से उन समस्याओं का समाधान किया है, जिनके लिए दुनिया के कई हिस्सों में क्रांतियाँ हुईं, रक्तपात हुआ। यही कारण है कि भारतीय लोकतंत्र टिकाऊ और मजबूत है। यह सिर्फ एक राजनीतिक व्यवस्था नहीं, बल्कि एक सामाजिक क्रांति का प्रतीक है, जो चुपचाप, दृढ़ता से अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रही है।
आर के भोपाल