नेपाल ने पाली थी चीनी बिल्ली।
बिल्ली चाट गयी मलाई ।
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नेपाल की वादियों में धुआँ तैर रहा है। ओली की बयानबाज़ी उन्हें डुबो चुकी है, वे गद्दी छोड़ भागने की सोच रहे हैं। संसद की चौखट पर अचानक जवान हुए लड़के घुस पड़े—दो दिन में ही तख़्त उलट गया। यही जवानी की ज्वाला है, जो क्षण भर में सब कुछ बदल देती है।
राष्ट्र की आत्मा से टकराई सत्ता टिकती नहीं। नेपाल और भारत का रिश्ता राजनीति का नहीं, संस्कृति का है—गोरखनाथ और पशुपतिनाथ एक ही विरासत के प्रतीक हैं। पर दशकों से नेपाल की वाम सत्ता इस अपनत्व से मुंह मोड़ चीन की ओर झुकी। नतीजा वही हुआ जो होना था।
बांग्लादेश या अफगानिस्तान में जो अराजकता दिखी, नेपाल वैसा नहीं है। यहाँ की भीड़ उग्र है, पर अभद्र नहीं। उन्नीस नौजवान पुलिस की गोली से न मारे जाते, तो शायद आग भी न लगती।
क्रांति हमेशा कीमत वसूलती है। सवाल इतना ही है—क्या नेपाल का युवक अपनी संस्कृति और आत्मा को अक्षुण्ण रख पाएगा? असली जीत वहीं होगी। सत्ता तो बस आती-जाती छाया है।
आर के भोपाल।