राधिका कॉलेज की लाइब्रेरी में बैठी थी। किताब खुली हुई थी, पर उसका ध्यान कहीं और था। उसकी आंखों में आँसू थे और हाथों में एक पुरानी चिट्ठी।
ये चिट्ठी उसे अपने बैग के कोने में आज ही मिली थी। यह चिट्ठी आर्यन ने लिखी थी — वही आर्यन जो तीन साल पहले बिना बताए शहर छोड़ गया था।
चिट्ठी में लिखा था:
"राधिका, शायद जब तुम ये पढ़ोगी तब मैं यहाँ नहीं रहूँगा। पर यकीन मानो, मैंने तुम्हें कभी छोड़ा नहीं। हालात ने मजबूर किया है, पर दिल अब भी तुम्हारे पास है। अगर किस्मत ने साथ दिया तो एक दिन लौटकर ज़रूर आऊँगा।"
राधिका ने चिट्ठी पढ़कर होंठों पर हल्की मुस्कान लाई।
“तो तुम गए नहीं थे, तुम तो हमेशा यहीं थे…”
उसी पल, लाइब्रेरी के दरवाज़े पर एक साया पड़ा।
राधिका ने सिर उठाया — सामने वही था, आर्यन।
उसकी आँखों में वही सच्चाई थी, वही इंतज़ार।
राधिका ने चिट्ठी को बंद किया और धीमे से कहा:
“अब चिट्ठी की ज़रूरत नहीं… क्योंकि तुम खुद लौट आए हो।”