मेरा गांव ----
सावन मे बरसे बदरा
बरखा बूँद पानी नाही
जैसे शोला शबनम आग!!
पिया मिलन कि आश
बादल मे छिपे सूरज
चाँद!
हवाओ मे उड़ती
जुल्फों मे चाँद सा
चेहरा लागे बारूद
गोला आग!!
सावन सुन्दर मन
भावन बिपत्ती क
झरना झील नदी
तालाब समंदर
दुर्भाग्य क बाढ़
कहर कराह
कायनात!!
आएगी जिंदगी जान
सावन मे इंतज़ार
हाथों मे मेंहदी महावर
धड़कते दिल कि
मेहमान!!
गांव नगर जवार
सावन कुल देवी देवता
क पूजा मंगल गान
तरह तरह के मानौती मान!!
सावन क बदरी
बरखा हरियाली
खुशहाली स्वप्न
स्वांग!!
सौगात विश्वास
कजरी के राग
डाली झूला और
कान्हा राधा रास!!
शिव स्तवन अभिषेक
इंद्र इच्छा परीक्षा कोप
शाप वरदान आशीर्वाद!!
नदी किनारे गाँव
तीन तरफ गंडक
छोटी नदी एक तरफ
ताल!!
मानस मे गोस्वामी जी
लंका सागर के मध्य
आस्था विश्वास क बात!!
लंका जस कलयुग मे
हमार गाँव चारो तरफ
नदी तालाब बाज़ार से
गांव क एक ही पथ राह!!
वर्ष क नौ माह कइसो
काम चल जाए गांव मे
पिछड़ा दलित मुसलमान
अधिकाय!!
खेती बारी इतने कि
तीयना तरकारी मिल
जाए अशिक्षा बेरोजगारी
नौजवान बेकार!!
आबो कुछ ऑटो
चलावे कुछ काम करे
हैसियत अनुसार!!
हाय रे सावन हर वर्ष
लिए आस हर्ष विसात
दिए जाए!!
सावन मे पूरा गाँव
जैसे सागर तालाब!!
नावे घर दुआर हर साल
चौथाई मकान गाँव क
ढह जाए फ़सल मेहनत
ऐसे बहे जैसे पानी मे
लड़िकन क कागज क
कस्ती नाव!!
लावारिस हस्ती क गांव
कहावत मशहूर रहा जवार मे
भाई केहू अपनी बेटा बेटी क
जन करिह वियाह रतन पूरा गाँव
देश नया नया आजाद
संसाधन तबो सीमित
तब कारण गुलामी
अब कारण संसाधन
पर जनसंख्या दबाव!!
जन्म से लेके दस बारह
साल सावन के देखे हई
हरियाली खुशहाली के
कहावत मात्र!!
सगरे गाँव के सावन भादो
खाली मछरी चूहा भुज खात
साल मे चार महीना कहर बाढ़!!
फ़सल खरीफ कैसो
होय पाय उहो गाँव के
सगरो घर के साल भर के
पेट भर सके नाही
हर साल बाढ़ी के दुर्गति के
प्रहर काल आजो बचपन के
दिन जैसे वर्तमान!!
हमार घर जैसन गांव मे
घर दुई चार मात्र जेकरे
असरे जिए गाँव के जाने
कितने परिवार!!
हाय रे सावन कहे क़े
मनभावन हरियाली
खुशहाली वाह रे
हमार गाँव!!
सावन रूवाए हर वर्ष
बदहाली हरियाली
खुशहाली सावन क़े
बदरा बरखा बौछार
जाईसन आंसू रोआवे!!
गांव छोड़ कही ना
जाए डाटा रहे सावन मे
गरीब गाँव गांव पुरुखन
के गौरवशाली इतिहास
बतावे!!
आजो सावन के
कहर गांव नगर
शहर ई बात अलग कि
हर वर्ष सावन के कहर के
गांव नगर अलग अलग!!
देश मे हर वर्ष
सावन मे कितने गाँव
उजड़ जाते बिहार मे
कोशी और असम
ब्राह्मपुत्र के दर्द साल
भर लोग सहलाते है!!
हर वर्ष सावन मे
कहर बिभिषिका के
नव अध्याय आयाम
लिख जाते है!!
रोते बिलखते दर्द
वेदना देते छोड़ जाते
मैंने बचपन पूरा
यही सत्य देखा है!!
सावन वास्तव वास्तविकता
दर्द दंश देखा जिया है जो
कभी स्मरण से ओझल नही
होता!!
ज़ब कही सावन मे
बाढ़ का कहर सुनता
बचपन गांव सावन
भादो का अतीत भाव
आज भी अनुभूतियों मे
जीता!!
नन्दलाल मणि त्रिपाठी पीताम्बर गोरखपुर उत्तर प्रदेश!