गांव की गलियों में बसा एक सपना,
सपने में छुपा था हर रंग-गुलाबी, सफा।
सपने में थे रिश्तों के सच्चे रंग,
हंसते चेहरे, और दिलों में प्यार के संग।
दिन के सूरज ने जैसे छेड़ा था गीत,
रात की चाँदनी में बसा था कोई रीत।
जो भी कर्म किया, वही था अपना,
कभी टूटे नहीं, फिर भी किया खुदा का दावा।
मिट्टी की खुशबू और खेतों का राग,
हर कठिनाई में था बस एक ठहाका, एक भाग।
कभी नहीं डरते, कभी न हारते,
गांव वालों के होंठों पर बस ये बातें फहरते।