Hindi Quote in Poem by Kishore Sharma Saraswat

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मैं पुस्तक हूँ

मैं पुस्तक हूँ

विद्या की जननी आजकल एकाकी हूँ बुजुर्गों की भाँति मुझे प्रेम करने वाले मुँह मोड़ चुके हैं

अधम कपूतों की भाँति ।

एक समय था

जब हर घर

मेरा सत्कार था

छात्र से गुरुजन तक मुझसे सभी को प्यार था।

देख अनुराग उनका आह्लादित मैं हो जाती थी

देकर भंडार ज्ञान का प्रारब्धवान उन्हें बना जाती थी।

अब समय बदल गया है बदल रहा है स्वभाव नई पीढ़ी को नफरत है मुझ से मोबाइल से हो गया है उनकों प्यार। रह-रह कर बंद शीशे से ताक रही हूँ

होकर बेताब

कोई हिती आएगा या मिथ्या रह जाएगा मेरा ख्वाब ।

बंद अलमारी में सजकर बैठी हूँ
प्रदर्शन और प्रशंसा की वस्तु की भाँति मुझे प्रेम करने वाले मुँह मोड़ चुके हैं अधम कपूतों की भाँति ।

ग्रीष्म के शुष्क थपेड़ों से जब सृष्टि व्याकुल हो जाती है वर्षा ऋतु की अवाई पर वह पुनः लहलहाने लग जाती है। सर्द हवाओं से चहुँ दिस ठिठुरन बढ़ जाती है बसंत आगमन पर यह धरा पुनः स्वर्ग बन जाती है। कभी आएंगे वर्षा-बसंत ऋतु की भाँति ।

आशा की यही किरण लिए मैं खुश हो जाती हूँ मेरे भी अच्छे दिन

मैं पुस्तक हूँ विद्या की जननी आजकल एकाकी हूँ बुजुर्गों की भाँति मुझे प्रेम करने वाले मुँह मोड़ चुके हैं अधम कपूतों की भाँति ।

Hindi Poem by Kishore Sharma Saraswat : 111946523
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