नैनीताल-१३
बहुत प्यार करना
मुझे भा गया था,
मोड़ से मुड़ना
मुझे आ गया था।
ठंडी थी सड़क
कोट था गहना,
जेब का पत्र
आ गया था पढ़ना।
हम जहाँ मिले थे
वही तीर्थ था अपना,
था झील को देखना
आदत का गहना।
मधुर थी लड़कियां
समझते थे लड़के,
वहाँ हैं वीरांगनायें
कहते थे लड़के।
राह बदलना
बहुत भा गया था,
प्यार की राह पर
चलना आ गया था।
मन्नतों के आगे
दीया जला था,
हमारी झोली में
विरह आ गया था।
*** महेश रौतेला