बेनाम सा ये दर्द ठहर क्यों नहीं जाता
जो बीत गया है वो गुजर क्यों नहीं जाता
वो एक ही चहेरा तो नहीं सारे जहां में
जो दूर है वो दिल से उतर क्यों नहीं जाता।
मैं अपनी ही उलझीं हुई राहों का तमाशा
जाते हैं सब उधर तो मैं क्यों नहीं जाता।
तमाम निशानियां भी मिटा चुकी पर
अब तक वो दाग जो तुमने दिया वो क्यों नहीं जाता।।